Monday, May 19, 2008

विलय

रौशनी जिस जगह
छू कर लौट गई
लगा मेरे अस्तित्व
की सीमा है.....

जब तेरे
आँखों की चमक
उजालों सी
मेरी रूह में उतरी
तो जाना
कोई अलग
अस्तित्व ही नहीं.....

Monday, May 12, 2008

नोक झोंक

चाहे चाँद आँखो में
बिठाकर
ज़रा मुस्कुराकर
दे दो ...देखो ...
मैं नहीं मानूँगी.....

चाहे लहरें गिना दो
उसमें से थोड़ी सी
लाली उठाकर
लगा दो
मैं नहीं मानूँगी.....

गाल पर गिरती
गीली नमी
नमकीन से
मीठा बना दो
मैं नहीं मानूँगी.....

थाम कर हाथ मेरा
नापसंद सारी
लकीरें मिठा दो
मैं नहीं मानूँगी.....

मनाते मनाते
अगर रूठ जाओ...
हँसाते हँसाते
अगर रो पड़ो तो....
सोचूँगी....
....शायद....
मैं नहीं मानूँगी.....
.............................



मनाया नहीं
और आँखों में चँदा
बिठाया नहीं
लहरों को लेकर
भिगोया नही
हाथ को थाम कर
लकीरे मिलाई नहीं
मेरे साथ में गर
हँसे तुम नहीं
रोते हुए
आँख नम ना हुई....

तो फिर....
................
सच में
रूठ जाऊँगी मैं.....

Sunday, May 11, 2008

विश्वास

जब भी तूफान आता है
वह पेड़ सिहर उठता है
उसे मालूम है
कि उसकी जड़ें
कितनी अंदर हैं...



बरगद नहीं गुजरा
कभी ऐसे डर से
क्योंकि
टहनियों से भी
जड़े उसने
टाँगी है..
...

ऐसा भी तूफान है
जब बरगद भी
उखड़ जाता है....
पर डरने से
वो तूफान
कहाँ थम पाता है....


गिरते गिरते..
...गिरे हुए
बरगद की...
उखड़ी हुई
इन साँसों में
विश्वास अमर
हो जाता है....

Saturday, May 10, 2008

विकल्प

हमेशा जिन्दगी
दाँव देकर
दुराहे पर मिलती है
और मुँह चिढ़ा कर
पूछती है
यह मुट्ठी कि यह
कभी एक में
मीठा झूठ
दूसरे में
कड़वा सच
एक में रूह की मंजिल
दूसरे में घर का पता
कभी अपनों से वफा
खुद से छल
कभी एक में सपना
और दूसरे में कर्तव्य
........
बंद मुट्ठी को देखकर
मेरा असमंजस जानकर
मुट्ठी खोलकर
पूछती है...
बताओ अब....
यह मुट्ठी कि यह

और मैं सोचती हूँ
जिंदगी के सवाल
हमेशा
इतने जटिल क्यों होते हैं.....?!

जीत कर भी हारा सा
अहसास
और हार कर भी
जीत का बिगुल....

जिंदगी क्यों कभी
मुट्ठी की
लकीरों में नहीं
थमती है.....?!

Thursday, May 08, 2008

आश्रय

तरंगों पर झूला
झूलकर भूलकर
नींद में खो जाने का
मन है.....

माँ तेरी गोद में
अँगडाइयाँ उतार कर
सो जाने का
मन है....

सहलाती उँगलियों से
जादू जो उतरे... उसमें
खो जाने का
मन है.....

तेरे आँचल में आ कर
हर चोट को...दर्द को
भूल जाने का
मन है.....

सहम कर जो सपने में उठूँ
जब कभी भी
तेरी खुशबू पकड़ सो जाने का
मन है...

तुझ में ही लौटकर
फिर एक बार..
अपनी पहचान पाने का
मन है....

तेरे स्नेह की छाँव में
खुद में सिमट कर सँभल कर
...जाग जाने का
मन है

Wednesday, May 07, 2008

आंसू

मैने देखा है
ओस की बूंद को
धूप में
सूख कर
हवा में उठते हुए
उड़ते हुए
जिद में अपनी
रुकते हुए
बादलों में ठहरते हुए
श्वेत से श्याम में
ढ़लकर
उजालों के आगे
धब्बे से लगते हुए
कतारों मे और भी
बूंदो को पीछे लगते हुए....
......
अपने ही भार से
लड़खड़ा कर
गिरते हुए....
बरसते हुए
फिर से बूँद बनते हुए.....
...................
उजालों को नहा कर
निकलते हुए
मुस्कुरा कर
इन्ही
बूँदों की गोद में
पसरते हुए

Monday, May 05, 2008

संकेत

वहीं था...
.....खामोश....
उसका होना
वहाँ की हवा को पता था

शायद किसी स्पर्श से जाग जाता
कोई साँस की फूँक से
साँस लेता
पोर को थाम
उठकर गाने लगता
हथेली के नीचे
उछल कूद करके
शोर को भी
वह लय में सुनाता...

संगीत था तो वहीं बस
शायद समय की
प्रतीक्षा उसे थी
जो छूकर उसे दे....
बोलने का इशारा
ब्रम्हाण्ड में स्वर
घोलने का इशारा...