Sunday, November 01, 2009

उद्यम













अपनी ज़मीन
और आसमां के बीच
क्षितिज के
दहलीज़ पर
एक तख्ते के ऊपर
पंक्ति में
अपराधियों की तरह
सारे
भ्रम विभ्रम
जो उभर आये
मानस पटल पर
चित्त के
दोगले संतान की तरह
...............
धकेलना है इन्हे
सीमाओं के परे
कोई ऐसी जगह
ब्रह्माण्ड में
जहाँ यह
सांस ले सके
शाश्वत सत्य की तरह....

Thursday, October 29, 2009

पहल














ऐसे भी रुकती है हवा
सांस रोक कर
कि उसके पांव
वहीं जड हो जाते हैं
........
ठोस
............
जैसे कोई दीवार खडी हो गई हो....
और उमस के साथ
उठती है
किसी बासी बात की गंध
सन्नाटे सी काई के नीचे
कुम्हला जाते हैं सुर
ध्वनि गूंगी हो जाती है
.................

मालूम है ना
ठहरी हुई हवा में
संगीत उभरता नहीं कभी
...............



क्यूँ ना...
तुम ही सांस फूंक दो
कि थोडी हलचल तो हो....

Friday, October 16, 2009

दु:स्वप्न














बंद नींद के दरवाज़े पर
अँधकारमय अस्पष्टता में
खटखटाता है कोई सपना
गाढे अंधेरे में
धुँधले से साये पहन
शरीर हो जाता है
फिर धीरे से फैलता है
एक अनोखी सी
गंध की तरह
पूरे कमरे में
...............
अनुभूतियों से अभिव्यक्ति के मुखौटे उतार
खरेपन में निहारता है
मन की पेटी खोल कर
लज्जा, डर, बौखलाहट ,दुख ...
हर्श, चैन, खुशबू, आराम....
प्यास ,तरस....
बिखेरता ही चला जाता है...
और तब
उस कमरे में रेंगते हैं साँप
ऊँची इमारत से
फिसल जाता है पाँव
कोई साया हाथ पहन
घोंटता है गला .
...........
बौखला कर
चैतन्य की तरफ
भागता है मन
सायों की पकड से जितनी दूर
... खोल देता है दरवाज़ा .......
सिटकनी पर रह जाते हैं
बौखलाहट के निशान
और पूरे चैतन्य पर
फैल जाती है गँध.....

Sunday, August 23, 2009

खामोशी की आकृति












यकीं मानो
खामोशी जिस्म पहनती है
पसर कर कहीं
बैठ जाती है जब
तब
बीच की जगह भर जाती है....

साही की तरह
नुकीले काँटे पहन
इस तरह
पास आती है...
कि बहुत नज़दीक बैठे हुए से भी
फासला बढ़ जाता है....

मैने देखा है इसे
आलिंगन को पहनते हुए
और तब
आगोश की तरह
गरम हो
रूह को छू लेती है....

खामोशी की परछाई है.....
कभी लंबी
कभी छोटी.....
कभी अँधेरे सी यह लगती है
और कभी
छाया सी ठंडक देती है...


कभी यह आवाज़ देती है
कभी इतना शोर मचाती है
हर आवाज़ से ऊँची
बस वही सुनाई देती है...

खामोशी चुप भी होती है
मुँह पर उँगली रख कर
सहमी हुई सी
किसी रूठे हुए बच्चे की
आँख के छोर पर
रुके आँसू की तरह.......
बेबस वहीं ठिठक रुक जाती है....

ऐसे में जब कोई
शब्द के पोर से
छूकर...
भर लेता है बाहों में...
आवाज़ बन, अनुराग बन......
खामोशी रो देती है.....

Tuesday, August 04, 2009

परिवर्तन














शब्द अलग थलग
संयोग और संयोजक के
इंतज़ार में
जैसे शोर एक भीड का ...
जिसकी कोई भाषा नहीं


शून्य के शोर में
बोध जो हावी हो रहा
क्रम ठिठक कर है खडा
निष्कर्ष अधूरा ही सही...

संभावनाओं के लिये
विकल्पों का चुनाव है
नये किसी अध्याय का
जुड़ना यहाँ सँभव नही

जीवनी की किताब से
बन सकती हूँ कोई जीवनी
नये जोखिम उठाने का
बीमा यहाँ होता नही

विचार को आचार से
लाद कर, गति मंद कर
निभा रहे दायित्व सब
नव अभिप्राय मार कर.....

संयोजक के अभाव मे
शब्द के भीड का...
भाव का...
कोई भी ठोस अर्थ नहीं

संयोग की कड़ी को
लगने मे अभी देर है..
नूतन किसी अभिप्राय का
हाल मे अवसर नहीं


Thursday, June 18, 2009

अधीन












गुलामी
बहुत प्राचीन
प्रवृत्ति है....


शायद इसीलिए लोग
नौकरी भी
गुलामी की तरह करते हैं....

परवरिश भी
सर झुकाने की अदा
सिखाने का
प्रशिक्षण भर है....

मालिक और गुलाम
का खेल
सभी रचाये बैठे हैं


हर उनमुक्त
ख्याल पर कई
घात लगाये
गए हैं


जो पैरों पर
खड़े हों तो तुरंत
हथकड़ी पहना दें इनको....


ज़रा देखो
तुम्हारे ख्यालों को किसने
परास्त किया है.....
वही तुम्हारा मालिक...
तुम उसके गुलाम हुए हो....

Sunday, May 17, 2009

खामोश















हमेशा हिंसा के साथ
शोर नहीं उठता
कोई हथियार
नहीं दिखता
क्रोध हावी नहीं होता
ना कोई लहूलुहान होता है.....
मौन को म्यान से निकाल
धार को
तेज़ कर
एक बेपरवाह नज़र के साथ
वार....
नहीं खून नहीं बहता.....
दर्द उठता है
और चीख भी उठती है....
लोग मुड़ कर देखते हैं
....फिर आगे बढ़ जाते हैं....


मौन मुस्कुराता है.....

............
हिंसा की जगह वह कभी
उँगलियों के निशां नहीं छोड़ता.......