उसकी सोहबत में कोई कमी तो नहीं
कस के पकड़ा था हाथ उसने भी
मेरे साथ को भी विश्वास था बहुत...
बस इसीलिए साथ पलना चाहा
किंतु....
इमारत पर अगर पेड़ उगना चाहे...
दरार पड़ती है....कमज़ोर करती है....
पेड़ भी देर सबेर सूख ही जाता है
ना जड़ें टिकती हैं...
ना बुनियाद ही सँभलती है...
.....................
फिर भी यकीन है तुझको अगर
साथ निभाने की जिद भी मन में ठानी है
शायद निभ भी जाये...किसे खबर
अपवाद से हम कहाँ इनकार करते हैं
Tuesday, July 12, 2011
Thursday, May 05, 2011
ऊब
होता है ना ऐसा
कोई दिन
बहता हुआ
इकट्ठा होने लगता है
किसी कीचड़ भरे
डबरे की तरह
रुका हुआ
.........
सोचती हूँ
साथ होते
तो शायद
चप्पल खोल
कुछ देर फुदकते
और दिन आगे बढ़ जाता
.................
कोई दिन
बहता हुआ
इकट्ठा होने लगता है
किसी कीचड़ भरे
डबरे की तरह
रुका हुआ
.........
सोचती हूँ
साथ होते
तो शायद
चप्पल खोल
कुछ देर फुदकते
और दिन आगे बढ़ जाता
.................
Monday, May 02, 2011
निवेदन
कुछ नया लिखो....
जब गिरा था घोंसला
जग उठा तब हौसला
इक तरफ बाढ़ थी
और इक तरफ नाव थी
अकस्मात जब हुए
सब खड़े साथ थे
बाल बाल बचा लिया
वो बाल था किसी और का
आँसुओं की धार से
आस की फसल उगा रहे
अर्थ सार्थक हो गया
भूख जब उससे मिटी
हाट में जब बम फटा
हाथ शरीर से कटा
उँगली पकड़ सहमी खड़ी
बेहोश थी पर बच गई
रौशनी प्यार की
इस कदर थी हर जगह
रात थी गहरी बहुत
पर रास्ते सब साफ थे
शहर गिरा और नीँव भी
घरों की छत गिर गई
नीड़ किंतु बच गये
जो स्नेह से बने
बहुत हुआ
खबर की कब्र पर
रोज़ फूल चढ़ रहे
कुछ अंक खप गये
कुछ रोज़ मर रहे
.....
कलम से तुम्हारे
सृजन हो, निर्माण हो
.....
उम्मीद लिखो
गीत लिखो
हँसी लिखो
बेबसी के बावजूद
मिली हर खुशी लिखो
...............
कुछ नया लिखो
जब गिरा था घोंसला
जग उठा तब हौसला
इक तरफ बाढ़ थी
और इक तरफ नाव थी
अकस्मात जब हुए
सब खड़े साथ थे
बाल बाल बचा लिया
वो बाल था किसी और का
आँसुओं की धार से
आस की फसल उगा रहे
अर्थ सार्थक हो गया
भूख जब उससे मिटी
हाट में जब बम फटा
हाथ शरीर से कटा
उँगली पकड़ सहमी खड़ी
बेहोश थी पर बच गई
रौशनी प्यार की
इस कदर थी हर जगह
रात थी गहरी बहुत
पर रास्ते सब साफ थे
शहर गिरा और नीँव भी
घरों की छत गिर गई
नीड़ किंतु बच गये
जो स्नेह से बने
बहुत हुआ
खबर की कब्र पर
रोज़ फूल चढ़ रहे
कुछ अंक खप गये
कुछ रोज़ मर रहे
.....
कलम से तुम्हारे
सृजन हो, निर्माण हो
.....
उम्मीद लिखो
गीत लिखो
हँसी लिखो
बेबसी के बावजूद
मिली हर खुशी लिखो
...............
कुछ नया लिखो
Wednesday, April 20, 2011
मध्यवर्गीय लड़की
बस की भीड़ में फँसी हुई
लेडिस कंपार्टमेंट में खड़ी हुई
हमेशा थोड़ी जल्दी में
कुमकुम में और हल्दी में
आटे में पानी कितना हो
और दिया की बत्ती कैसी हो
सास की चाय की शक्कर और
टीके लगवाने के चक्कर सब
चश्मे के पीछे आम शक्ल
पर कर्मठ तन, बेजोड़ अक्ल
कार चलाना सीखती है
शेरिंग ऑटो से आती है
यह लोग जो इसके साथ खड़े
सब फ्रेम में अच्छे लगते हैं
पर चहकती सी वह आम हँसी
सब फ्रेम बदलना जानती है
नज़दीक से देखो जब उसको
थोड़ी दिवानी लगती है
अपनों के सुकून के खातिर
जान दाँव पर लगा आ जाती है
भूचाल कहीं
आक्रोश कहीं
अखबार में सब छपते हैं
खामोश सी ये बात जो चल निकली
आँधी में नक्शे ढह जायें
जाओ पत्री सब पढ़ आओ
तकदीर बदलने वाली है
कोई विद्रोह नहीं ना अनशन है
बस इनकी फसल तैयार खड़ी....
लेडिस कंपार्टमेंट में खड़ी हुई
हमेशा थोड़ी जल्दी में
कुमकुम में और हल्दी में
आटे में पानी कितना हो
और दिया की बत्ती कैसी हो
सास की चाय की शक्कर और
टीके लगवाने के चक्कर सब
चश्मे के पीछे आम शक्ल
पर कर्मठ तन, बेजोड़ अक्ल
कार चलाना सीखती है
शेरिंग ऑटो से आती है
यह लोग जो इसके साथ खड़े
सब फ्रेम में अच्छे लगते हैं
पर चहकती सी वह आम हँसी
सब फ्रेम बदलना जानती है
नज़दीक से देखो जब उसको
थोड़ी दिवानी लगती है
अपनों के सुकून के खातिर
जान दाँव पर लगा आ जाती है
भूचाल कहीं
आक्रोश कहीं
अखबार में सब छपते हैं
खामोश सी ये बात जो चल निकली
आँधी में नक्शे ढह जायें
जाओ पत्री सब पढ़ आओ
तकदीर बदलने वाली है
कोई विद्रोह नहीं ना अनशन है
बस इनकी फसल तैयार खड़ी....
Tuesday, April 19, 2011
खोये शब्द
शब्द छूटे थे सभी
वे मौन से समझदार जो ना थे
अतीत को फुसला कर
व्याकरण में
संजो कर रखा करते थे
स्मृति को परिभाषा में
बाँध कर रखा करते थे
कुछ छूटे कुछ छोड़ दिए
यूँ ही
अपनी बात कहना भी हम भूल गए
............
आज तूफान ही ने झकझोरा है
बारिश ने शब्दों को फिर पुकारा है
नन्हे कोंपल से ये ज़मीं से निकल आये हैं
केंचुए से ये रेंगते भी दिखते हैं
बात जो खत्म थी
उनपर फफूँद से उग आये हैं
गलती लकड़ी पर भी
मशरूम सी है छतरी खोली....
.........
शब्द आकुल हैं
जीवन अभी जारी है
कविता लिखने को कई...
अभी बाकी है....
वे मौन से समझदार जो ना थे
अतीत को फुसला कर
व्याकरण में
संजो कर रखा करते थे
स्मृति को परिभाषा में
बाँध कर रखा करते थे
कुछ छूटे कुछ छोड़ दिए
यूँ ही
अपनी बात कहना भी हम भूल गए
............
आज तूफान ही ने झकझोरा है
बारिश ने शब्दों को फिर पुकारा है
नन्हे कोंपल से ये ज़मीं से निकल आये हैं
केंचुए से ये रेंगते भी दिखते हैं
बात जो खत्म थी
उनपर फफूँद से उग आये हैं
गलती लकड़ी पर भी
मशरूम सी है छतरी खोली....
.........
शब्द आकुल हैं
जीवन अभी जारी है
कविता लिखने को कई...
अभी बाकी है....
Monday, April 18, 2011
मैं घर लौटना चाहती हूँ
एसबेस्टस की बनी छत की छेद से
कैसा तो बड़ा आसमान दिखता था
कभी लगता था रात को जब आँख लगी होगी
तारा कोई बिस्तर पर लुढ़क गिरेगा
घर जिसके कोनों पर मैने पेंसिल से
अपना नाम लिखा था
कैसी पुरानी सी दिवारें थी
उनपर हरा डिस्टेम्पर
नायलान की उस लंबी सी रस्सी पर
माँ की साड़ी,
पापा का बुशर्ट
माँ की साड़ी से कैसी तो
माँ सी खुशबू आती थी
घर में कैसे गुनगुन करते
मैं और भैया रहते थे
माँ पापा की बातें सुनते
जाने कब सो जाते थे
जब हौले से हाथ जो फिरता
नींद तब खुल जाती थी....
कैसी प्यारी धूप निकलती
कैसे चिड़िया गाती थी
......
फिर आज दोबारा
घर लौट कर जाना है
डिस्टेम्पर पर फीके पड़ते
लिखे नाम पहचानने हैं....
.......
थोड़ा सा बचपन का जादू
बाँध संग ले आना है
बहुत अकेलेपन में सुनने को
पापा की लोरी लानी है.......
कैसा तो बड़ा आसमान दिखता था
कभी लगता था रात को जब आँख लगी होगी
तारा कोई बिस्तर पर लुढ़क गिरेगा
घर जिसके कोनों पर मैने पेंसिल से
अपना नाम लिखा था
कैसी पुरानी सी दिवारें थी
उनपर हरा डिस्टेम्पर
नायलान की उस लंबी सी रस्सी पर
माँ की साड़ी,
पापा का बुशर्ट
माँ की साड़ी से कैसी तो
माँ सी खुशबू आती थी
घर में कैसे गुनगुन करते
मैं और भैया रहते थे
माँ पापा की बातें सुनते
जाने कब सो जाते थे
जब हौले से हाथ जो फिरता
नींद तब खुल जाती थी....
कैसी प्यारी धूप निकलती
कैसे चिड़िया गाती थी
......
फिर आज दोबारा
घर लौट कर जाना है
डिस्टेम्पर पर फीके पड़ते
लिखे नाम पहचानने हैं....
.......
थोड़ा सा बचपन का जादू
बाँध संग ले आना है
बहुत अकेलेपन में सुनने को
पापा की लोरी लानी है.......
Monday, January 03, 2011
स्वाभाविक

समय का स्वभाव था
सो गुजर गया
सूरज कभी चढ़ा था
फिर उतर गया
यह भावुकता का विषय नहीं
तथ्य है
नैसर्गिक
चिर निरंतर का सच
कहते हैं
गुजरा समय लौटा नहीं करता
पर फिर भी
लगता है यूँ कि
यह उभरता है
जैसे जलते कागज़ पर
अक्षर साफ होते हैं
पुराने खाने का स्वाद
खट्टी डकार में
उठता है
तस्वीर की झुर्रियाँ भी
हँसती प्रतीत होती है
आवाज़ सुनाई नहीं देती
पर उसका जायका
जीभ में घुलता है
कहीं किसी लिखाई के जाने पहचाने
तिरछेपन से
समय लड़खड़ा जाता है
अपने ही स्वभाव से मजबूर
समय बीतता जाता है
खुद अपने सीने पर
परत दर परत
नयी कहानियाँ रख कर
उसके नीचे दबता है
................
पत्ते उतर जाते हैं
फिर भारी बरफ के भीतर
जमकर दफ्न होते हैं
सम्मूर्छित
निष्क्रिय
समय बीतता है
गुजरता है
और बीता हुआ समय
फिर अनुकूल होता है
कोंपल फूटते हैं
फूल लगते हैं
इतिहास फिर
खुद को दोहराता है….
...
यह भावुकता का विषय नहीं
तथ्य है ....
कि इस बीच जीवन
गुजर जाता है....
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