
हवा,घटा और तूफान
मैं जंगल थी
और खोई हुई पगडंडी भी
गहन गाढ़ा कोई अहसास
मिट्टी भी
गले पत्तों में
पनपता कोई अंकुर भी
मैं वो लम्हा थी
जहाँ सच के दायरे
अपनी जड़े कस रहे थे
मैं आवाज़ थी...
और वह शब्द भी
जो अर्थ खो चुका अब तक
मैं वो पहचान थी
जिसका नाम ही ना था
वो संवाद थी
जिसका अनुवाद असँभव था...
प्रसंग भी....कहानी भी...
अनूठा कोई अनुभव भी....
.....खंडित पहचान के
अंश सी...
विभाजित....
अकेली थी...
सहेली थी....
पहेली थी...
समाधान भी...
एक लम्हा ही सही
समूची थी...
अपूर्व थी...
संपूर्ण थी...









