Friday, December 11, 2009

पैराडौक्स

इस मौन का
अनुवाद नहीं
इस ठहराव की गति नहीं
इस अंतराल पर
रुक कर
कोई उक्ति
अर्थ में जुड़ सके
सँभव नहीं
शब्द को मौन से ढँक कर
दफ्न कर..
विरक्ति
का ढेर कर....
मुड गये....
..................




उम्मीद में...



......शायद...

वो आर्द्रता तुम्हारे पास हो...
दफ्न उस शब्द को
अंकुरित कर सको......

Friday, November 13, 2009

मैं














हवा,घटा और तूफान
मैं जंगल थी
और खोई हुई पगडंडी भी
गहन गाढ़ा कोई अहसास
मिट्टी भी
गले पत्तों में
पनपता कोई अंकुर भी
मैं वो लम्हा थी
जहाँ सच के दायरे
अपनी जड़े कस रहे थे
मैं आवाज़ थी...
और वह शब्द भी
जो अर्थ खो चुका अब तक
मैं वो पहचान थी
जिसका नाम ही ना था
वो संवाद थी
जिसका अनुवाद असँभव था...
प्रसंग भी....कहानी भी...
अनूठा कोई अनुभव भी....
.....खंडित पहचान के
अंश सी...
विभाजित....
अकेली थी...
सहेली थी....
पहेली थी...
समाधान भी...
एक लम्हा ही सही
समूची थी...
अपूर्व थी...
संपूर्ण थी...

Sunday, November 01, 2009

उद्यम













अपनी ज़मीन
और आसमां के बीच
क्षितिज के
दहलीज़ पर
एक तख्ते के ऊपर
पंक्ति में
अपराधियों की तरह
सारे
भ्रम विभ्रम
जो उभर आये
मानस पटल पर
चित्त के
दोगले संतान की तरह
...............
धकेलना है इन्हे
सीमाओं के परे
कोई ऐसी जगह
ब्रह्माण्ड में
जहाँ यह
सांस ले सके
शाश्वत सत्य की तरह....

Thursday, October 29, 2009

पहल














ऐसे भी रुकती है हवा
सांस रोक कर
कि उसके पांव
वहीं जड हो जाते हैं
........
ठोस
............
जैसे कोई दीवार खडी हो गई हो....
और उमस के साथ
उठती है
किसी बासी बात की गंध
सन्नाटे सी काई के नीचे
कुम्हला जाते हैं सुर
ध्वनि गूंगी हो जाती है
.................

मालूम है ना
ठहरी हुई हवा में
संगीत उभरता नहीं कभी
...............



क्यूँ ना...
तुम ही सांस फूंक दो
कि थोडी हलचल तो हो....

Friday, October 16, 2009

दु:स्वप्न














बंद नींद के दरवाज़े पर
अँधकारमय अस्पष्टता में
खटखटाता है कोई सपना
गाढे अंधेरे में
धुँधले से साये पहन
शरीर हो जाता है
फिर धीरे से फैलता है
एक अनोखी सी
गंध की तरह
पूरे कमरे में
...............
अनुभूतियों से अभिव्यक्ति के मुखौटे उतार
खरेपन में निहारता है
मन की पेटी खोल कर
लज्जा, डर, बौखलाहट ,दुख ...
हर्श, चैन, खुशबू, आराम....
प्यास ,तरस....
बिखेरता ही चला जाता है...
और तब
उस कमरे में रेंगते हैं साँप
ऊँची इमारत से
फिसल जाता है पाँव
कोई साया हाथ पहन
घोंटता है गला .
...........
बौखला कर
चैतन्य की तरफ
भागता है मन
सायों की पकड से जितनी दूर
... खोल देता है दरवाज़ा .......
सिटकनी पर रह जाते हैं
बौखलाहट के निशान
और पूरे चैतन्य पर
फैल जाती है गँध.....

Sunday, August 23, 2009

खामोशी की आकृति












यकीं मानो
खामोशी जिस्म पहनती है
पसर कर कहीं
बैठ जाती है जब
तब
बीच की जगह भर जाती है....

साही की तरह
नुकीले काँटे पहन
इस तरह
पास आती है...
कि बहुत नज़दीक बैठे हुए से भी
फासला बढ़ जाता है....

मैने देखा है इसे
आलिंगन को पहनते हुए
और तब
आगोश की तरह
गरम हो
रूह को छू लेती है....

खामोशी की परछाई है.....
कभी लंबी
कभी छोटी.....
कभी अँधेरे सी यह लगती है
और कभी
छाया सी ठंडक देती है...


कभी यह आवाज़ देती है
कभी इतना शोर मचाती है
हर आवाज़ से ऊँची
बस वही सुनाई देती है...

खामोशी चुप भी होती है
मुँह पर उँगली रख कर
सहमी हुई सी
किसी रूठे हुए बच्चे की
आँख के छोर पर
रुके आँसू की तरह.......
बेबस वहीं ठिठक रुक जाती है....

ऐसे में जब कोई
शब्द के पोर से
छूकर...
भर लेता है बाहों में...
आवाज़ बन, अनुराग बन......
खामोशी रो देती है.....

Tuesday, August 04, 2009

परिवर्तन














शब्द अलग थलग
संयोग और संयोजक के
इंतज़ार में
जैसे शोर एक भीड का ...
जिसकी कोई भाषा नहीं


शून्य के शोर में
बोध जो हावी हो रहा
क्रम ठिठक कर है खडा
निष्कर्ष अधूरा ही सही...

संभावनाओं के लिये
विकल्पों का चुनाव है
नये किसी अध्याय का
जुड़ना यहाँ सँभव नही

जीवनी की किताब से
बन सकती हूँ कोई जीवनी
नये जोखिम उठाने का
बीमा यहाँ होता नही

विचार को आचार से
लाद कर, गति मंद कर
निभा रहे दायित्व सब
नव अभिप्राय मार कर.....

संयोजक के अभाव मे
शब्द के भीड का...
भाव का...
कोई भी ठोस अर्थ नहीं

संयोग की कड़ी को
लगने मे अभी देर है..
नूतन किसी अभिप्राय का
हाल मे अवसर नहीं