अलसाया सा दिन
सुस्ताया पहर
उलझी उलझी सी गली
मिट्टी जली जली
हल्की सी लू
कोयल की कुहू
अमिया के पत्तों में
हवा करे गुफ्तगू
लू थोड़ी और चली
नन्ही अमिया भी गिरी
थोड़ी फ्राक में इकट्ठा की
फिर भैया को आवाज़ दी
हल्की बून्दाबान्दी
सौन्धी मिट्टी की खुशबू
भैया तो नहीं था
ना जाने कौन खड़ा था!!
धूप में सिंका धूमिल चेहरा
बस आँखे चमक रही थी
मरी मासूमियत की लाश
उसे कँधे पर उठाये कुछ सवाल
कद में थोड़ा छोटा ही था
पाँव में हम दोनों के चप्पल नहीं थी
मेरी अमिया फ्राक के झोले में थी
उसका पेट फटे बुशर्ट से थोड़ा बाहर
बारिश तेज़ होने लगी थी
सूखे पत्ते गीले होकर
पाँव के पास सरक रहे थे
कबूतर ठहनी से ठुकर ठुकर देख रहे थे
वह रास्ते में खड़ा था
मुझे घर जाना था
ना जाने भैया कहाँ था
“अमिया खाओगे?” पूछा था
य़ूँ देखा उसने
लगा हँसी उड़ाई हो
बाल हम दोनों के बिखरे ही थे
पर हमारी पहचान बिल्कुल अलग सी थी
ऊपर से नीचे तक देखा था
धूल मुझ पर भी कम नहीं थी
उसने हाथ ना जाने कब धोये थे
मेरे हाथ भी मिट्टी से सने थे
“बड़ी अमिया तोड़ के दूँ
क्या रोटी ला दोगी?
बहुत प्यास भी लगी है
थोड़ा पानी भी देना”
रसोई में जो मिला
सब दौड़ कर ले आई
“नहीं अमिया नहीं चाहिये, रोटी लो
लोटे में पानी है, क्या पिला दूँ?”
बारिश और तेज़ हुई
लोटे का पानी भी खत्म
उसकी दहकती आँखो में हुई
मेरी मासूमियत भी थोड़ी भस्म
सुस्ताया पहर
उलझी उलझी सी गली
मिट्टी जली जली
हल्की सी लू
कोयल की कुहू
अमिया के पत्तों में
हवा करे गुफ्तगू
लू थोड़ी और चली
नन्ही अमिया भी गिरी
थोड़ी फ्राक में इकट्ठा की
फिर भैया को आवाज़ दी
हल्की बून्दाबान्दी
सौन्धी मिट्टी की खुशबू
भैया तो नहीं था
ना जाने कौन खड़ा था!!
धूप में सिंका धूमिल चेहरा
बस आँखे चमक रही थी
मरी मासूमियत की लाश
उसे कँधे पर उठाये कुछ सवाल
कद में थोड़ा छोटा ही था
पाँव में हम दोनों के चप्पल नहीं थी
मेरी अमिया फ्राक के झोले में थी
उसका पेट फटे बुशर्ट से थोड़ा बाहर
बारिश तेज़ होने लगी थी
सूखे पत्ते गीले होकर
पाँव के पास सरक रहे थे
कबूतर ठहनी से ठुकर ठुकर देख रहे थे
वह रास्ते में खड़ा था
मुझे घर जाना था
ना जाने भैया कहाँ था
“अमिया खाओगे?” पूछा था
य़ूँ देखा उसने
लगा हँसी उड़ाई हो
बाल हम दोनों के बिखरे ही थे
पर हमारी पहचान बिल्कुल अलग सी थी
ऊपर से नीचे तक देखा था
धूल मुझ पर भी कम नहीं थी
उसने हाथ ना जाने कब धोये थे
मेरे हाथ भी मिट्टी से सने थे
“बड़ी अमिया तोड़ के दूँ
क्या रोटी ला दोगी?
बहुत प्यास भी लगी है
थोड़ा पानी भी देना”
रसोई में जो मिला
सब दौड़ कर ले आई
“नहीं अमिया नहीं चाहिये, रोटी लो
लोटे में पानी है, क्या पिला दूँ?”
बारिश और तेज़ हुई
लोटे का पानी भी खत्म
उसकी दहकती आँखो में हुई
मेरी मासूमियत भी थोड़ी भस्म




4 comments:
बहुत बढ़िया, बधाई!!
बड़े भावुक है इसके अंतरंग…बहुत सुंदर लगा।
वाह आपने तो तीन महीन पहले ही गर्मी का मौसम
ला दिया!
अनूप जी क्या करें दुबई में मौसम बदल गया । लू के साथ कुछ यादें भी चली आई । समीर जी और दिव्यभजी कविता सराहने का शुक्रिया ।
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