प्यारी सारा,
बहुत दिनों से सोच रही हूँ कि तुम्हे खत लिखूँ । मुझे बच्चे बहुत पसंद है । बच्चों में जिज्ञासा और मासूमियत होती है.....और अतीत बहुत छोटा...इसलिए कोई पूर्व धारणा भी नहीं होती....। बच्चों की डाक्टर हूँ...इसलिए हर तरह के बच्चों से मिलना होता है । इंजेक्शन नहीं देती और स्वभाव अब तक भी काफी हद तक बच्चों जैसा ही है...इसलिए हमारी बहुत बनती है ।
तुम्हारी दोस्त ने कहा , 'अंडा खाएगी तो मुरगी बन जाएगी!' और तुमने मान लिया ?
अंडा खाने से कोई भी मुर्गी नहीं बनता । चाहो तो फिर खा कर देख लो । मैं अंडा खाती हूँ ....अभी तक तो मुर्गी नहीं बनी । हाँ बचपन में मास्टरजी ने मुर्गा ज़रूर बना दिया था । पर उस दिन मैने अंडा नहीं खाया था ।
अंडा एक पौष्टिक आहार है । प्रोटीन में सबसे अधिक संपूर्ण आहार । और मुझे इसलिए पसंद है कि फट से काम खत्म हो जाता है ।
कुछ लोग अंडा नहीं खा सकते । उन्हे अंडे से एलर्जी होती है। कुछ लोग खाना नहीं चाहते । मेरा बेटा भी नहीं खाता था । कहता था यह मुर्गी बनने वाला था ना ! नहीं खाना तो नहीं खाये.... चना और दाल बराबर खा ले ....। किसी दिन खाने को मन करेगा ते खा लेगा । ना भी खाये तो कोई नुकसान नहीं है ।
तुमने सवाल किया था,'मम्मी तुम क्यों पूजा नहीं करती?'
मैने भी किया था । हम आरती क्यूं नहीं करते?
मेरी मम्मी ने जो कहा था वही बता देती हूँ ।
पानी; ... नदी, झरना, बरसात और कुआँ ....कहीं से भी मिल सकता है । पर पानी पीना जरूरी है ।
पूजा करो या इबादत अगर परलौकिक शक्ती से परिचित हो सको तो सार्थक है सब ।
'मुसलिम लोग बड़े गंदे होते हैं, वो बढ़ई होते हैं, कूड़ा उठाते हैं, दर्जी होते हैं। तू क्या है?'
तुम्हे पता है ...तुम क्या हो ? सारा हो.....कच्ची मिट्टी की तरह....अभी संपूर्ण रूप में नहीं ढली हो । लड़की, मुसलमान, बेटी, बहन, विध्यार्थी....यह सब तुम्हारी पहचान का अंश है....पूरी पहचान नहीं । कोई तुम्हे गली से, कोई राज्य से,रंग से , कोई देश से पहचान देगा....पर वह भी तुम्हारी संपूर्ण पहचान नहीं होगी ।
सवाल अच्छा है....और जटिल भी.....मैं आज तक नहीं सुलझा सकी । पूछो, सोचो और जानने की कोशिश करो ।
सवाल पूछना बहुत अच्छी आदत है । ज्ञान अर्जित करने का इससे अच्छा उपाय नहीं । सभी तरह के सवाल पूछो.....ग्लास का आकार ग्लास जैसा क्यूँ....चाँद रोज़ अलग क्यूँ दिखता है....फूल रंगबिरंगे क्यूँ होते हैं.....।
सभी धर्म के लोग सभी तरह के काम करते हैं । काम कोई भी हो सभी का समाज में उपयुक्त और आवश्यक स्थान है । गंदे वो होते हैं जो शारीरिक या मानसिक रूप पर गंदगी चिपका कर घूमते हैं । पर इन गंदे लोगों की गंदगी भी स्थाई नहीं है । चाहो तब साफ की जा सकती है । कभी साबुन से तो कभी सही विचार धारा से ।
'पापा मुसलमानों ने ऐसा क्यों किया? मुझे मुसलमान पसंद नहीं हैं, उनके फेस्टिवल भी कम होते हैं।'
तुम्हारी टीचर के जवाब से लगता है कि उन्हे भी संपूर्ण विषयों की जानकारी नहीं है ।
अच्छा गुरु मिलना आजकल के जमाने में भाग्य की बात हो गई है । पर इस बात से तुम्हारा ज्ञान विकलांग नहीं होगा । आज तुम दुनिया के किसी भी कोने में बैठ कर हर तरह के लोगों का दृष्टीकोण और हर विषय का तथ्य जान सकती हो । और तुम्हारी कोशिश भी इसी तरफ अग्रसर होनी चाहिए ।
फेस्टीवल की बात तुमने सही करी । मुझे भी ऐसा लगता था । पर मैने इसका उपाय निकाल लिया । हम हर त्योहार मना लेते हैं......होली में रंगों से ना खेलो....दिवाली में फटाखे ना फोड़ो.....ईद में सेंवई ना खाओ और क्रिसमस में क्रिसमस ट्री ना बनाओ तो क्या आनन्द !!
पता नहीं तुम ऐसा कर सकोगी की नहीं । ना भी कर सको तो कोई बात नहीं....याद रहे जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है ।
कभी फोर कार्नरस खेली हो ? कभी कभी बौम्ब द सिटी के नाम से भी खेला जाता है । धुन शुरू होती है और सभी लोग एक एक कोना ढूँढ लेते हैं । कोई एक कोना आउट हो जाता है । फिर खेल शुरू ।
हम बड़े भी बच्चों जैसे ही हैं...कहीं धुन शुरू होती है....हम झट से अपना कोना पकड़ कर खड़े हो जाते हैं । एक तरह से यह अच्छी बात है । हर कोने से उस कोने को दृष्य साफ दिखता है । इसे ब्रेनस्टार्मिंग कह सकते हैं ।.........पर स्टार्म करने के बाद निदान तक पहुँचना ज़रूरी है....नहीं तो तूफान में ही खो जाने का डर है।
उलझनों को और समस्याओं को समझना जरूरी है । समाधान ढूँढने की यह पहली सीढ़ी है । पर उनसे उलझे रहना मूर्खता । समाधान की तरफ ध्यान बाँधेंगे तभी समाधान प्राप्य होगा ।
ईर्ष्या , कटुता और कट्टरता आज या कल मिले रोग नहीं है । यह मनुष्य बनने पर स्वाभाविक रूप से हमसे जुड़े हैं । यही यह भी बताती है कि हमारे पूर्वज जानवर थे ।
सोचो अगर एक शेर से उसका मारा हिरण दूसरा शेर ले ले तो क्या होगा !
सही कहा जम कर लड़ाई होगी !!
लड़ाई करना हमारा जानवर सिद्ध अधिकार है। एक मज़हब के लोग दूसरे मज़हब के लोगों से लड़ते हैं....एक देश दूसरे से........एक धर्म के अलग अलग विभाजन एक दूसरे से....एक घर में एक भाई दूसरे से लड़ पड़ता है ।
लड़ाई करना एक स्वाभाविक कमज़ोरी है .....ना करना विकास और सभ्यता की निशानी है ।
सभ्यता भी ऐच्छिक है । चाहो तो सभ्य रह सकते हो ।
....पर जानवर मनुष्य के ऊपर नहीं....मनुष्य जानवर के ऊपर है.....ज़ाहिर है....आगे कौन जायेगा ।
जिन्दगी से गुजरते हुए कई अनुभव तुम्हे मिलेंगे । कुछ अच्छे कुछ बुरे । पर तुम क्या बनोगी यह तुम्हारी प्रतिक्रिया पर निर्भर है ।
उदाहरण देती हूँ । काँच , सोना और कपड़ा....हर किसी को कूठो और पीठो....होगा क्या ??
सारा ,अपना वज़ूद ठोस बनाओ कि दुनिया के थपेड़े भी तुम्हारे व्यक्तित्व में निखार ला सकें....
हाँ तुम्हारे अम्मी और अब्बू इसमें अहम भूमिका निभा सकते हैं...... । और मुझ जैसे बड़े भी ।
तुम सारा हो । बहुत प्यारा नाम है....। तुम्हे इस धरती पर हर किसी दूसरे जितना हक है । मेरी दुआ है .....अपने रंगों में खिलो और महको ।
होली है....ज़रा मेरे रंगों को लगाकर देखो........
प्यार
बेजी
Tuesday, February 27, 2007
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21 comments:
"पानी, ... नदी, झरना, बरसात और कुआँ ....कहीं से भी मिल सकता है । पर पानी पीना जरूरी है ।
पूजा करो या इबादत अगर परलौकिक शक्ती से परिचित हो सको तो सार्थक है सब"
बहुत सटीक पंक्तियाँ...
वाह! सिम्प्ली फैन्टास्टिक।
बहुत अच्छे। तारीफ़ के लिए शब्दों की कमी पड़ रही है।
प्रिय सारा के लिये इससे बेहतर खत और क्या हो सकता है.यह उस तक पहुंचना चाहिए.
मुझे लगता था आप कविता ही अच्छी करती है, आप तो गद्य में भी उतनी ही सशक्त है.
बहुत सरलता से दमदार बाते कहीं है.
यह साराओं के लिए ही नहीं इरफानो के लिए भी उपयोगी है.
गजब !
बहुत अच्छा लेखन, सहेजने लायक लेख। बधाई!!
बहुत अच्छा लिखा आपने ।
काश ! सारा को ये संदेश उसके माँ बाप, सही सही शब्दों और भावनाओं के साथ पहुँचा पाते ।
खत को माध्यम बना कर आपने बहुत खूबसूरती से बहुत सी अनकही अनसमझी बातों का खुलासा कर दिया.....बधाई स्वीकारें
ok Beji !!!
tumharii
Sara
spelling mistake :-
ज्ञान वर्जित करने का इससे अच्छा उपाय नहीं ।
इस आलेख की तारीफ को शब्दों में बांध कर कम नहीं करना चाहता!!
बस मौन प्रशंसा दिल से निकली है, जरुर आप तक पहूँचेगी.
आपके विचार मौलिक और सरल तो लगे ही साथ ही दृढ भी ....
तुम्हे पता है ...तुम क्या हो ? सारा हो.....कच्ची मिट्टी की तरह....अभी संपूर्ण रूप में नहीं ढली हो । लड़की, मुसलमान, बेटी, बहन, विध्यार्थी....यह सब तुम्हारी पहचान का अंश है....पूरी पहचान नहीं । कोई तुम्हे गली से, कोई राज्य से,रंग से , कोई देश से पहचान देगा....पर वह भी तुम्हारी संपूर्ण पहचान नहीं होगी ।
उपरोक्त पंक्तियां बहुत प्रभवित करती हैं..
बेजी जी,
आपने वही लिखा है जिसे मेरे पापा जी भी अक्सर हमेँ कहा करते थे -
यही होगा जिसने, भरपूर आत्म विश्वास व उदारता दिल मेँ बचपन से आजतक
कायम रखी हुई है --
काश ! हम सभी, ऐसी सोच रखेँ - तो दुनिया कितनी सुँदर हो जाये !
परँतु,
सच इस यटोपियन फेन्टेसी से बहुत अलग और कुरुप है ! :-(
जिसका खेद होते हुए भी, इस विश्व व्यापी सँचार जगत के प्रसार से,
इस मेँ बदलाव की आशा करती हूँ कि, जब लोग आपसी विचारोँ को
समझेँगेँ तब, विभिन्नता मेँ भी एकता खोज कर, साथ रहना सीख लेँगे,
आपको स्नेह्,
लावण्या
बेंजी, कितना सही लिखा है आपने, तारीफ़ के लिए शब्द तलाशने पड़ रहे हैं। दिल को छू लिया आपके लिखे ने।
साधु-साधु
बहुत अच्छी चिट्ठी लिखा आपने सारा को! बधाई!
बेजी जी,
बहुत सुन्दर, सहज ही स्नेह और आत्मीयता पूर्वक शिक्षा देता हुआ!
काश! सभी अभिवावक इसी प्रकार से करते बच्चों से बातें।
absolutely beautiful!
मैं आभारी हूँ कि आप सभी यहाँ आये और इस खत को पढ़ा ।
बहस काफी गर्म थी और शायद इसे सही दिशा में और आगे ले जाया जा सकता है ।
मुझे इसमें सारा का घसीटा जाना नामंजूर था । अतीत को सुलझाने के चक्कर में भविष्य को उलझाने की जरूरत नहीं है ।
anonymous जी spelling mistake सुधार ली गई है । शुक्रिया बताने के लिए ।
Bahut hi khoob!
Bade hi marmik tarike se samjhaya aapne.
सारा ही क्यों ये ख़त तो हर बच्चे के नाम है।
"पानी; ... नदी, झरना, बरसात और कुआँ ....कहीं से भी मिल सकता है । पर पानी पीना जरूरी है ।
पूजा करो या इबादत अगर परलौकिक शक्ती से परिचित हो सको तो सार्थक है सब ।"
--
बहुत खूबसूरत। शायद सब से अधिक सारपूर्ण वाक्य हैं इस चिट्ठी में। मैं बस यह और जोड़ देता - "..और यदि परलौकिक शक्ति से परिचित न भी हो, तब भी कोई बात नहीं। इस लोक में इन्सान बनो, परलोक/भगवान को ऐसे मानो, वैसे मानो, या भले न मानो।"
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