Friday, March 02, 2007

रंग दे पिया

तुमसे होकर गुजर जाने दो
रंगो में बिखर जाने दो

बिखरे हुए रंगो को
अंग से लिपट जाने दो

मेरे सपनों के खाको में तुम
पक्के रंगो को चड जाने दो

अपने ख्वाबो की रेखाओ में
मुझको सिमट जाने दो

सूरज की लाली से आज...
टेसू का रंग लाकर दो....

नीले गगन से मुझे...
रंगीन बदली चुराकर दो...


छूकर मुझे पलकों से...
थोड़ा पिघल जाने दो....

चाहत में तेरे मुझे...
थोड़ा सुलग जाने दो...

धुँधले धुंए में जरा ...
रंग से रंग मिल जाने दो....

थोड़ा सँवर जाने दो...
मुझको निखर जाने दो....

थोड़ा भिगो दो मुझे....
थोड़ा निचुड़ जाने दो...

तेरे आगोश में मुझको....
नये रंगो में रंग जाने दो....

8 comments:

Divine India said...

"ये अल्हड़ता ये बाँकपन…होली की रंगीन
छ्टा को सहजता से घोल रही है…
भर कर पिचकारी भावुक…कोमल भावनाओं
की सब पर जल्वे बिखेर रही है…"।
"आपको होली की ढेरों शुभकामनाएँ"!!!
उपर तो कह ही दिया इस रचना की उत्कृष्टता पर
अब कुछ बचा नहीं…सुंदर!!!

मोहिन्दर कुमार said...

आप को एंव आपके समस्त परिवार को होली की शुभकामना..
आपका आने वाला हर दिन रंगमय, स्वास्थयमय व आन्नदमय हो
होली मुबारक

manya said...

prem rang me rangi naayika.. priyatam me sama jane ki khwaahish.. ki suraj ki laali bhi bindiya si lage aur aasmaan chunirya si.. bhegi palaken.. sulagi saansen.. nikhar gaya priya ki preet mein har rang.. aur kya kahun..

Udan Tashtari said...

आपको होली की बहुत मुबारकबाद और शुभकामनायें. :)

Anonymous said...

बेजी जी....

आपकी कविता एक दम मस्त लगी !!

रिपुदमन पचौरी

Sunil Deepak said...

"तुम से हो कर गुज़र जायें ... सिर्फ़ ख्वाबों में तुम्हें समेट कर रखें ..." कुछ अधिक ही सेल्फ डिनायल नहीं है क्या? यह तो पुरुष अक्सर करते हें, बस हो कर गुज़र जाते हें, और ख्वाबों में समेट कर रखना यानि असली जीवन का न सोचना, यह तो बहुत आरामदायक है. क्षमा कीजियेगा अगर यह टिप्पणी कविता जैसी रूमानी नहीं है! :-)
आप को होली की शुभकामनाँए

Beji said...

"तुम से हो कर गुज़र जायें ... सिर्फ़ ख्वाबों में तुम्हें समेट कर रखें ..." कुछ अधिक ही सेल्फ डिनायल नहीं है क्या? यह तो पुरुष अक्सर करते हें, बस हो कर गुज़र जाते हें, और ख्वाबों में समेट कर रखना यानि असली जीवन का न सोचना, यह तो बहुत आरामदायक है."

Sunil Deepakजी किरण को देखा है....कुछ बूँदों से गुजरे तभी रंगों में परिवर्तित होती हैं....इन्द्रधनुष बन जाती हैं....किरण के ऐसे अस्तित्व की पहचान संक्षेत्र बने बूँद ही दे सकते हैं ।

पुरुष हो या स्त्री अक्सर ऐसा नहीं होता । मैं जिस गुजरने की बात कर रही हूँ वह एक अस्तित्व को दूसरे के अस्तित्व से छान कुछ बहुत खूबसूरत अस्तित्व हासिल करने की बात है ।

"ख्वाबों में समेट कर रखना "

पंक्ति यह थी
अपने ख्वाबो की रेखाओ में
मुझको सिमट जाने दो
ख्वाबों में एक धुँधला चित्रण होता है...हकीकत कई बार करीब से गुजरती है किन्तु पूरी तरह से ख्वाब के रेखाचित्र सी नहीं होती....क्या बुरा है कि मैं चाहूँ कि मैं उसके ख्वाब सा बन जाऊँ ??

अनूप भार्गव said...

बेजी:

अच्छी लगी ये कविता , विशेष रूप से ये पंक्तियां :

>थोड़ा भिगो दो मुझे....
>थोड़ा निचुड़ जाने दो...