Monday, April 09, 2007

हवा मैं…

चली चली ..
रेत पर टीले बनाते हुए...
लहर से तट पर चित्र बनाते हुए...
बादलों के ढेलों को गूंदती हुई....
फिरकी को गोल घुमाते हुए....


चली चली....
आँछल को लहराते हुए....
बुदबुदाते हुए...गुदगुदाते हुए....
कागज़ की नाव को चलाते हुए..
जामुनों की बारिश कराते हुए...

चली चली...
लाल बेरी को ज़मीं पर बुलाते हुए...
सूखे पत्तों की सरसराहट से धुन बनाते हुए.....
नन्ही अमिया को ड़ाली से छुड़ाते हुए...
झाड़ की छाया को झुलाते हुए….

चली चली...
बारिश के छींटों को छिड़कते हुए....
फूलों के गुच्छों पर झूमते हुए...
पत्तियों के संग खिलखिलाते हुए...
कलियों के संग लजाते हुए....

चली चली....
रसोई से रोटी की खुशबू उड़ाते हुए...
मां के हाथों के जादू को महकाते हुए...
गीले पापड़ को होड़ में सुखाते हुए...
मटकी में ठंडक मिलाते हुए...


चली चली....
कभी सुस्त...कभी चुस्त....हो मस्त चली

7 comments:

प्रियंकर said...

नॉस्टैल्जिया (गृह-विस्मार) के रूमान से भरी-पूरी भावुक और प्रगीतात्मक अभिव्यक्ति जिसमें बीता हुआ समय और छूटा हुआ संसार हिलोरें लेता है . और उसकी लहरें मन को छू-छू जाती हैं .

Udan Tashtari said...

एक बहती रचना जो दिल को छू गई!! बहुत खूब, बधाई.

Reetesh Gupta said...

चली चली....
रसोई से रोटी की खुशबू उड़ाते हुए...
मां के हाथों के जादू को महकाते हुए...
गीले पापड़ को होड़ में सुखाते हुए...
मटकी में ठंडक मिलाते हुए...

बहुत सुंदर भाव हैं ....बधाई

SHUAIB said...

अगर इसको गा कर सुनाएं तो बहुत ख़ूब रहेगा - अच्छी रचना है, बधाई

sunita (shanoo) said...

क्या सुन्दर चित्रण किया है आपने,...वाह! हवा बह चली है बहुत बहुत बधाई आपको
सुनीता(शानू)

Tarun said...

मटकी में ठंडक मिलाते हुए

बहुत खूब

Beji said...

प्रियंकर जी आपकी टिप्पणी मेरी कविता से भी अच्छी है...
समीर जी,रीतेश,सुनिता जी और Tarun आपके प्रोत्साहन का शुक्रिया....

SHUAIB जी सच कहते हैं कोई गा कर सुना देता तो शायद बहुत अच्छा लगता....हाँ मुझसे उम्मीद मत रखिये...मैं लोरी गाऊँ तो बच्चे उठ कर बैठ जाते हैं... :)