जब से याद आता है
मैं बस यहीं रही हूँ
दाना यहीं मिल जाता है
मैं यहीं चुग लेती हूँ
फुदक कर
कभी यहाँ
कभी वहाँ
कभी दूर नहीं गई
धूप का मेरा टुकड़ा
मेरे पास आ जाता है
छाँव की मेरी चादर
रोज़ ओढ़
सो जाती हूँ
कभी पोखर में
निहारती हूँ
तो पँख मुझे
दिख जाते हैं...
फुदकते फुदकते
अधखुले से खुल
जाते हैं
पँख फैला कर
उड़ान कब भरी है?!!
छलांगों में ही
गन्तव्य मुझे
मिल जाता है
आज पोखर में
अंबर देखा जब
जकड़े हुए इन पँखों ने
उड़ने का सपना
देखा है
नभ पर
एक मंजिल दिखती है
बादल से
गुज़र कर जाती है
क्षितिज तक का
रस्ता तो दिखता है
फिर रस्ता
कुछ धुँधला सा है
पँख गर मेरे पास हैं तो
मंजिल उड़ान ही होगी ना?
फिर उड़ने से
क्यों हिचकता है?
गिरने से
डर क्यूँ लगता है?!
छोटी छोटी छलांगों से
क्यूँ तृप्त हो जाता है?!
फुदकने को उड़ान
समझता है...
छाँव को आकाश
पुकारता है...
मैं बस यहीं रही हूँ
दाना यहीं मिल जाता है
मैं यहीं चुग लेती हूँ
फुदक कर
कभी यहाँ
कभी वहाँ
कभी दूर नहीं गई
धूप का मेरा टुकड़ा
मेरे पास आ जाता है
छाँव की मेरी चादर
रोज़ ओढ़
सो जाती हूँ
कभी पोखर में
निहारती हूँ
तो पँख मुझे
दिख जाते हैं...
फुदकते फुदकते
अधखुले से खुल
जाते हैं
पँख फैला कर
उड़ान कब भरी है?!!
छलांगों में ही
गन्तव्य मुझे
मिल जाता है
आज पोखर में
अंबर देखा जब
जकड़े हुए इन पँखों ने
उड़ने का सपना
देखा है
नभ पर
एक मंजिल दिखती है
बादल से
गुज़र कर जाती है
क्षितिज तक का
रस्ता तो दिखता है
फिर रस्ता
कुछ धुँधला सा है
पँख गर मेरे पास हैं तो
मंजिल उड़ान ही होगी ना?
फिर उड़ने से
क्यों हिचकता है?
गिरने से
डर क्यूँ लगता है?!
छोटी छोटी छलांगों से
क्यूँ तृप्त हो जाता है?!
फुदकने को उड़ान
समझता है...
छाँव को आकाश
पुकारता है...




11 comments:
पानी की थाली में जगमग
तूने चाँद जो देखा है
दिलासा है वो तेरे मन की
या ढाढस की रेखा है
छाँव है छलावा, उड़ान है ज़रूरी.....
ओह! तो ये कोई पंखों वाली गिलहरी है..!
SHURU ME LAGTAA HAI KI JAHAN daana MIL GAYAA,JAHAN EK TUKDAA DHUUP MIL GAYII ,BAS VAHIN JEEVAN GUZAR JAAYEGAA KHUSHI KHUSHI,MAGAR AISA HOTA NAHI HAI.SACH TO YE HAI ki ek samay baad phir se udaney ko mun kartaa hai.....SUNDAR BHAAV..
मुझे तो आपकी कविता में आंगन में फुदकती गौरेया नज़र आई। सुंदर ढ़ंग से उसके भावों को गुथा है आपने इस कविता में।
इतनी प्यारी रचना पढ़कर मन पंछी बनने को मचल उठा. काश कि पंख होते तो ऊँची उड़ान भरने की चाह पूरी हो जाती है...!
छाँह धूप और चिड़िया ?
बेहद सुंदर कविता.
मुझे तो कऊआ बनना है
सुबह सुबह उठूं बुद्धदेव के बंगले मे जाऊं
और काऊं काऊं मचाऊं
झक्कास कविता, सीधे दिल से दिल तक
"पँख गर मेरे पास हैं तो
मंजिल उड़ान ही होगी ना?
फिर उड़ने से
क्यों हिचकता है?
गिरने से
डर क्यूँ लगता है?!"
बहुत सशक्त अभिव्यक्ति है. इसे हम दोचार दिन में लोगों के समक्ष लायेंगे. इस चिट्ठे को सारथी पर सक्रिय चिट्ठों की सूची में भी जोड दिया है -- शास्त्री
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !
मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी
लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??
चिड़ियाँ हो गयी हें आप
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