Tuesday, February 27, 2007

एक खत सारा के नाम

प्यारी सारा,

बहुत दिनों से सोच रही हूँ कि तुम्हे खत लिखूँ । मुझे बच्चे बहुत पसंद है । बच्चों में जिज्ञासा और मासूमियत होती है.....और अतीत बहुत छोटा...इसलिए कोई पूर्व धारणा भी नहीं होती....। बच्चों की डाक्टर हूँ...इसलिए हर तरह के बच्चों से मिलना होता है । इंजेक्शन नहीं देती और स्वभाव अब तक भी काफी हद तक बच्चों जैसा ही है...इसलिए हमारी बहुत बनती है ।

तुम्हारी दोस्त ने कहा , 'अंडा खाएगी तो मुरगी बन जाएगी!' और तुमने मान लिया ?

अंडा खाने से कोई भी मुर्गी नहीं बनता । चाहो तो फिर खा कर देख लो । मैं अंडा खाती हूँ ....अभी तक तो मुर्गी नहीं बनी । हाँ बचपन में मास्टरजी ने मुर्गा ज़रूर बना दिया था । पर उस दिन मैने अंडा नहीं खाया था ।

अंडा एक पौष्टिक आहार है । प्रोटीन में सबसे अधिक संपूर्ण आहार । और मुझे इसलिए पसंद है कि फट से काम खत्म हो जाता है ।

कुछ लोग अंडा नहीं खा सकते । उन्हे अंडे से एलर्जी होती है। कुछ लोग खाना नहीं चाहते । मेरा बेटा भी नहीं खाता था । कहता था यह मुर्गी बनने वाला था ना ! नहीं खाना तो नहीं खाये.... चना और दाल बराबर खा ले ....। किसी दिन खाने को मन करेगा ते खा लेगा । ना भी खाये तो कोई नुकसान नहीं है ।

तुमने सवाल किया था,'मम्‍मी तुम क्‍यों पूजा नहीं करती?'

मैने भी किया था । हम आरती क्यूं नहीं करते?
मेरी मम्मी ने जो कहा था वही बता देती हूँ ।

पानी; ... नदी, झरना, बरसात और कुआँ ....कहीं से भी मिल सकता है । पर पानी पीना जरूरी है ।
पूजा करो या इबादत अगर परलौकिक शक्ती से परिचित हो सको तो सार्थक है सब ।

'मुसलिम लोग बड़े गंदे होते हैं, वो बढ़ई होते हैं, कूड़ा उठाते हैं, दर्जी होते हैं। तू क्‍या है?'

तुम्हे पता है ...तुम क्या हो ? सारा हो.....कच्ची मिट्टी की तरह....अभी संपूर्ण रूप में नहीं ढली हो । लड़की, मुसलमान, बेटी, बहन, विध्यार्थी....यह सब तुम्हारी पहचान का अंश है....पूरी पहचान नहीं । कोई तुम्हे गली से, कोई राज्य से,रंग से , कोई देश से पहचान देगा....पर वह भी तुम्हारी संपूर्ण पहचान नहीं होगी ।

सवाल अच्छा है....और जटिल भी.....मैं आज तक नहीं सुलझा सकी । पूछो, सोचो और जानने की कोशिश करो ।

सवाल पूछना बहुत अच्छी आदत है । ज्ञान अर्जित करने का इससे अच्छा उपाय नहीं । सभी तरह के सवाल पूछो.....ग्लास का आकार ग्लास जैसा क्यूँ....चाँद रोज़ अलग क्यूँ दिखता है....फूल रंगबिरंगे क्यूँ होते हैं.....।

सभी धर्म के लोग सभी तरह के काम करते हैं । काम कोई भी हो सभी का समाज में उपयुक्त और आवश्यक स्थान है । गंदे वो होते हैं जो शारीरिक या मानसिक रूप पर गंदगी चिपका कर घूमते हैं । पर इन गंदे लोगों की गंदगी भी स्थाई नहीं है । चाहो तब साफ की जा सकती है । कभी साबुन से तो कभी सही विचार धारा से ।



'पापा मुसलमानों ने ऐसा क्‍यों किया? मुझे मुसलमान पसंद नहीं हैं, उनके फेस्टिवल भी कम होते हैं।'

तुम्हारी टीचर के जवाब से लगता है कि उन्हे भी संपूर्ण विषयों की जानकारी नहीं है ।
अच्छा गुरु मिलना आजकल के जमाने में भाग्य की बात हो गई है । पर इस बात से तुम्हारा ज्ञान विकलांग नहीं होगा । आज तुम दुनिया के किसी भी कोने में बैठ कर हर तरह के लोगों का दृष्टीकोण और हर विषय का तथ्य जान सकती हो । और तुम्हारी कोशिश भी इसी तरफ अग्रसर होनी चाहिए ।

फेस्टीवल की बात तुमने सही करी । मुझे भी ऐसा लगता था । पर मैने इसका उपाय निकाल लिया । हम हर त्योहार मना लेते हैं......होली में रंगों से ना खेलो....दिवाली में फटाखे ना फोड़ो.....ईद में सेंवई ना खाओ और क्रिसमस में क्रिसमस ट्री ना बनाओ तो क्या आनन्द !!

पता नहीं तुम ऐसा कर सकोगी की नहीं । ना भी कर सको तो कोई बात नहीं....याद रहे जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है ।


कभी फोर कार्नरस खेली हो ? कभी कभी बौम्ब द सिटी के नाम से भी खेला जाता है । धुन शुरू होती है और सभी लोग एक एक कोना ढूँढ लेते हैं । कोई एक कोना आउट हो जाता है । फिर खेल शुरू ।

हम बड़े भी बच्चों जैसे ही हैं...कहीं धुन शुरू होती है....हम झट से अपना कोना पकड़ कर खड़े हो जाते हैं । एक तरह से यह अच्छी बात है । हर कोने से उस कोने को दृष्य साफ दिखता है । इसे ब्रेनस्टार्मिंग कह सकते हैं ।.........पर स्टार्म करने के बाद निदान तक पहुँचना ज़रूरी है....नहीं तो तूफान में ही खो जाने का डर है।

उलझनों को और समस्याओं को समझना जरूरी है । समाधान ढूँढने की यह पहली सीढ़ी है । पर उनसे उलझे रहना मूर्खता । समाधान की तरफ ध्यान बाँधेंगे तभी समाधान प्राप्य होगा ।

ईर्ष्या , कटुता और कट्टरता आज या कल मिले रोग नहीं है । यह मनुष्य बनने पर स्वाभाविक रूप से हमसे जुड़े हैं । यही यह भी बताती है कि हमारे पूर्वज जानवर थे ।

सोचो अगर एक शेर से उसका मारा हिरण दूसरा शेर ले ले तो क्या होगा !
सही कहा जम कर लड़ाई होगी !!

लड़ाई करना हमारा जानवर सिद्ध अधिकार है। एक मज़हब के लोग दूसरे मज़हब के लोगों से लड़ते हैं....एक देश दूसरे से........एक धर्म के अलग अलग विभाजन एक दूसरे से....एक घर में एक भाई दूसरे से लड़ पड़ता है ।


लड़ाई करना एक स्वाभाविक कमज़ोरी है .....ना करना विकास और सभ्यता की निशानी है ।

सभ्यता भी ऐच्छिक है । चाहो तो सभ्य रह सकते हो ।
....पर जानवर मनुष्य के ऊपर नहीं....मनुष्य जानवर के ऊपर है.....ज़ाहिर है....आगे कौन जायेगा ।

जिन्दगी से गुजरते हुए कई अनुभव तुम्हे मिलेंगे । कुछ अच्छे कुछ बुरे । पर तुम क्या बनोगी यह तुम्हारी प्रतिक्रिया पर निर्भर है ।

उदाहरण देती हूँ । काँच , सोना और कपड़ा....हर किसी को कूठो और पीठो....होगा क्या ??

सारा ,अपना वज़ूद ठोस बनाओ कि दुनिया के थपेड़े भी तुम्हारे व्यक्तित्व में निखार ला सकें....

हाँ तुम्हारे अम्मी और अब्बू इसमें अहम भूमिका निभा सकते हैं...... । और मुझ जैसे बड़े भी ।

तुम सारा हो । बहुत प्यारा नाम है....। तुम्हे इस धरती पर हर किसी दूसरे जितना हक है । मेरी दुआ है .....अपने रंगों में खिलो और महको ।

होली है....ज़रा मेरे रंगों को लगाकर देखो........

प्यार
बेजी

Sunday, February 25, 2007

फासले

इतने पास हो…..
कुछ तो कहो….
सुन्न से सन्नाटे के शोर में….
घुट रहा है मन….!

चुप मेरा सुन कर….
यूँ चुप हुए…
बात ऐसे करेंगे ...
कब तक…??!!

भूली हर ड़गर…
इस शोर में….
फासले बढ़ गये….
वक्त भी थमा थक…


तू देख ले अगर…
हमसफर!
मिल जायेगा रास्ता…
मुझे तुझ तक ।

इक आवाज़ दे दे….
पता तो चले….
कहाँ तू खड़ा...
किस तरफ रुख !!

अब अभिमान की नहीं
बात संकोच की ,
तय तुमने ही की
अब तक दूरियाँ ;
कैसे कहूँ ?!
रास्ता अनजान अब तक !!
……………

कितने पास हो ?
कुछ तो कहो,
इस शोर में,
घुट रहा मेरा मन….!

Thursday, February 22, 2007

पाँच सवाल

अनूपजी जवाब लिख रही हूँ..... ( लंबा लेख लिखना कितना कठिन होता है आज जाना । छह सवाल थे इसलिए एक गप्प कर गई)

१.आपकी सबसे प्रिय पिक्चर कौन सी है? क्यों?
मासूम
निर्देशन- शेखर कपूर
कहानी-गुलज़ार
संगीत- आर डी बरमन
कलाकार- नसीरुद्दीन शाह, शभाना आज़मी, जुगल हँसराज, सईद जा़फरी, तनुजा, उर्मीला माटोंडकर, आराधना, सुप्रिया पाठक

मासूम एक संपूर्ण अनुभव है ।
कहानी को बहुत सहजता से सँभाला है । इंसानी रिश्तों की बुनियाद....उन्हे देती चुन्नौतियाँ....व्यक्तित्व की कुछ कमजोरियाँ....उनका परिणाम....परिणाम का दायित्व....परिवार का आधार...उसकी सीमओ में पला विश्वास...उस विश्वास को देती चुन्नौतियाँ....उनसे उभरने का प्रयत्न....बिखरे सपनों को समेटने की कोशिश....
.........और इस चक्रव्यूह में फँसा एक नादान, निहत्था और निर्दोष मासूम.....

सही और गलत.....विश्वास और क्षमा........इन से झूझते हुए एक नारी....जो अपने मातृत्व को अनदेखा नहीं कर सकी।

कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि कोई सीख दी जा रही हो......
हर किरदार का दृषटिकोण बखूबी प्रस्तुत किया है । कोई गलत नहीं है...पर कहीं कोई ज्यादा तो कोई कम सही है ।
गीत भी हर जगह एकदम उपयुक्त....और कहानी को गती और प्रवाह देते हैं । थोड़ा समय भी देते हैं कि हम मनन कर सके...
सभी का अभिनय भी काबिले तारीफ़ है.....एक ऐसा अनुभव की आज भी देखूँ तो आँख भर आती है ।




२.आपके जीवन की सबसे उल्लेखनीय खुशनुमा घटना कौन सी है ?
बीस साल की उम्र थी ।
ढ़ेर सारे सपने...आत्मविश्वास...अनुभव की कमी....सच्चे प्रेम की तलाश....
जिसने पसंद किया उसे हँसी में उड़ा दिया.....जिसको पसंद किया उसने दूसरा रास्ता किया....

कुछ खुद के अस्तित्व की तलाश थी....तब जयसन से मिली....

एक दोस्त मिला जो प्यार बन गया....
जैसा चाहती थी वैसा कुछ भी नहीं था.....
मैं झरने की तरह थी......वो समन्दर की तरह....
मैं बादलों की तरह.....वो आकाश की तरह....
मैं बहकी, मचली सी....वो एकदम स्थिर.....

मन करता था कि किसी बेल की तरह इस बरगद के पेड़ पर आश्रित हो जाऊँ.....पर यह उसे नामंजूर था.....अपनी जमीन ढूँढो ....आसमान खोजो......मैं हूँ तो तुम्हारा.....पर तुम तुम हो....अपनी पहचान ढूँढो.....

मेरे जीवन में वो जब आया...तो समझा मैं कौन हूँ.....

तुम लड़खड़ाओ तो सँभाल लूँगा...पर चढ़ना कहाँ है....तुम बूझो....

तब खुश हुई थी....अब तक हूँ....।

३.आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते/करती हैं?
लेख, साहित्य, व्यंग्य, हास्य , कविता......कुछ भी.....जो भी सहजता से समझ आ जाये । बहुत लंबा, अत्याधिक कठिन शब्दों से सुसज्जित, कठ्ठर धार्मिक चिट्ठे मैं कम ही पढ़ती हूँ । चिट्ठा चर्चा हर रोज़ पढ़ती हूँ ।


४.क्या हिन्दी चिट्ठेकारी ने आपके व्यक्तिव में कुछ परिवर्तन या निखार किया?
कवितायें लिखना एक मजबूरी सी है । जब कोई बात दिल को एकदम छू जाती है....खुद ब खुद कुछ शब्द एक क्रम में बँध जाते हैं । मेरा लिखा हुआ पढ़ने वालों की हमेशा कमी रही । जो जानते हैं वे कहते हैं कि बेजी यह सब सुना कर बोर मत किया कर ।भाई को पकड़ पकड़ कर सुनाती थी....तो एकदिन बोला...मेरी प्यारी बहन, देख तेरे लिए एक ब्लौग खोला है...वहीं लिखा कर...मैं पढ़ लिया करूँगा.। मैने सोचा सही ही कह रहा होगा । रोमन में ही लिखा करती थी । किसी ने छेड़ा कि रोमन में ख्वाब बुन...ख्वाब भुन लग रहा है। तब देवनागिरी की खोज शुरू की । बड़ी मुश्किल से इन्सटाल कर लिखना शुरू किया । एक दिन गल्ती से प्रतीक जी की पोस्ट मिली । अपने ब्लाग की बात टिप्पणी में लिखी....उन्होने सम्मिलित कर ली ।

यहाँ आकर देखा तो महसूस हुआ......एक हम ही बीमार नहीं है ।

यह एक बडी बात थी....क्यों कि कभी कभार लगता था ......पता नहीं मैं जो लिखती हूँ क्या मेरे अलावा किसी और को भी समझ आता है भी या नहीं ।

भाई को जो फायदा हुआ सो अलग.....मैं बोर भी नहीं करती और खुश भी रहती हूँ.....
पति को जरूर शिकायत होने लगी है....पूछते हैं.....बता तुझे मुझसे प्यार है या तेरे बलौगस्पौट और हिन्दी चिट्ठाकारी से?
५.यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे/चाहेंगी?
एक बार फिर से संस्कृत भारतवर्ष की भाषा बन सके ।
मेरा मानना है कि भाषा आने वाली पीढ़ियों को संस्कृति घरोहर में देती है । हम संस्कृत का ज्ञान ना होने की वजह से अपनी ही पहचान पूरी तरह नहीं कर सके । पूर्वज हमारे लिए इतना प्रिय खजाना छोड़ गये और हमने उसे अपने अतीत में गाढ़ दिया । संस्कृत कुछ समर्थ , सक्षम लोगों एवम् इनका अध्ययन करने वालों तक सीमित रह गई ।
वेद, गीता,महाभारत........हिन्दू धर्म, भगवान बुध की कही बाते, भगवान महावीर के बताये मार्ग.....सब अनुवाद के मोहताज....।
मंत्र कर्णप्रिय तो लगते हैं.....पर आम इन्सान के लिए इसका अर्थ समझ कर जपना मुश्किल.....

हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्थता गुरुकुल में थी.....ज़ाहिर है....सारा अध्ययन संस्कृत में था....

....सातवी तक संस्कृत पढ़ी है....पर इसका ज्ञान रत्ती भर भी नहीं.....

अपनी पहचान के खातिर ...हम सभी की पहचान के लिए मैं यही बदलना चाहूँगी । जब तक जड़ें मजबूत ना हो....ठहनियों में कहाँ से जान आयेगी.....??


अब बात परंपरा को आगे बढ़ाने की....सवाल यही.....जवाब आप दें –
सुनिलजी, रजनीजी, प्रियंकरजी, लावण्याजी और राकेशजी


http://www.kalpana.it
http://rajnigandhaa.blogspot.com/
http://lokaraag.blogspot.com/
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होमवर्क खत्म !!!

Wednesday, February 14, 2007

मिलन

कुछ नये सपने अपने मुट्ठी में कर
मेरी पलकों में फिर उनको तू भर
पुराने सपनों में उठी रूईयॉ
हकीकत से इनकी बडी दूरियाँ

कोई ख्याल ख्वाब सा लाकर दे
बँद तहखाने से कोई याद हाथों में ले
मासूमियत पर पडी हैं झुर्रियॉ
लेकर आ पुरानी कोई लोरियॉ

दीवारों पर कहानी मिटने लगी है
नये रंग से रंगने को तैयार खडी है
आज फिर इनके बीच आ बसायें आशियॉ
उँगली से पकड़ कर लाये रश्मियॉ

घुटने से उठे अरसा हो गया
पैरों पर खडे अब थकने लगे हैं
अपने सहारों की दे दे बैसाखियॉ
अब लडखडाने से डर लगता साथियॉ

अधूरा था तू…अधूरी थी मैं
साथ होकर भी कभी अधूरे लगते हैं हम
आजा… आज भुला दे खामियॉ
मैं जैसी भी हूँ …हूँ तेरी साथियॉ

आज तारीक़ क्या है…पता ही नहीं
वार का भी ध्यान मुझको नही
तू साथ हो …हँसे पगडण्डियाँ …
खिले कलियॉ …अपनी लगे गलियॉ
…………………………………
मिलन की बजे शहनाईयॉ

Saturday, February 10, 2007

सुबह का इंतज़ार

बड़ा घना अँधेरा है
रात बिल्कुल सुन्न है
दिशायें एक दूसरे से
नाम पता पूछ रहीं है.....

सूरज उगे तो जाने
पूरब किस ओर है....

रात भी बड़ी ढीठ है..
सुबह को दबोच कर बैठी है...
ना सरकती है...
ना सिमटती है....

जब तक यह खींचा तानी है...
तुम उठ कर बत्ती तो जला दो....!!

Wednesday, February 07, 2007

भ्रम

एक शंख …
लहरों की आवाज़…
थोड़ा नमक….
थोड़ा पानी…..

यूँ ही इतरा रही…
यह सोच…
अंजली में समन्दर है….!
दिवानी !!

Sunday, February 04, 2007

एक दोपहर

अलसाया सा दिन
सुस्ताया पहर
उलझी उलझी सी गली
मिट्टी जली जली

हल्की सी लू
कोयल की कुहू
अमिया के पत्तों में
हवा करे गुफ्तगू

लू थोड़ी और चली
नन्ही अमिया भी गिरी
थोड़ी फ्राक में इकट्ठा की
फिर भैया को आवाज़ दी

हल्की बून्दाबान्दी
सौन्धी मिट्टी की खुशबू
भैया तो नहीं था
ना जाने कौन खड़ा था!!

धूप में सिंका धूमिल चेहरा
बस आँखे चमक रही थी
मरी मासूमियत की लाश
उसे कँधे पर उठाये कुछ सवाल

कद में थोड़ा छोटा ही था
पाँव में हम दोनों के चप्पल नहीं थी
मेरी अमिया फ्राक के झोले में थी
उसका पेट फटे बुशर्ट से थोड़ा बाहर

बारिश तेज़ होने लगी थी
सूखे पत्ते गीले होकर
पाँव के पास सरक रहे थे
कबूतर ठहनी से ठुकर ठुकर देख रहे थे

वह रास्ते में खड़ा था
मुझे घर जाना था
ना जाने भैया कहाँ था
“अमिया खाओगे?” पूछा था

य़ूँ देखा उसने
लगा हँसी उड़ाई हो
बाल हम दोनों के बिखरे ही थे
पर हमारी पहचान बिल्कुल अलग सी थी

ऊपर से नीचे तक देखा था
धूल मुझ पर भी कम नहीं थी
उसने हाथ ना जाने कब धोये थे
मेरे हाथ भी मिट्टी से सने थे

“बड़ी अमिया तोड़ के दूँ
क्या रोटी ला दोगी?
बहुत प्यास भी लगी है
थोड़ा पानी भी देना”

रसोई में जो मिला
सब दौड़ कर ले आई
“नहीं अमिया नहीं चाहिये, रोटी लो
लोटे में पानी है, क्या पिला दूँ?”

बारिश और तेज़ हुई
लोटे का पानी भी खत्म
उसकी दहकती आँखो में हुई
मेरी मासूमियत भी थोड़ी भस्म

Saturday, February 03, 2007

ना जाने क्यूँ …

जज़्बातों का सैलाब फ़िर आया है
तेरी यादों का चाँद आसमान में फ़िर छाया है

कौन से जख्मों का दर्द तू आज लाया है
मेरे दिल में भी आज इनका साया है

कहा नाम दो… हमने तो बेनाम ही इसे निभाया है
ना अपना ना तू कोई पराया है

हर रोज़ दुआओ के दियो को सजाया है
जब भी बुलाया…सिर हिलाया है

कोई रिश्ता तो रब ने बनाया है…!!
क्या यूं ही मुझे हँसाया और रुलाया है ??