Saturday, March 31, 2007

अरमान

कहीं आसमाँ के नीचे
ज़मी से ऊपर
किसी बादल की तरह
चाँद सितारों को अपने आँचल में लेकर
तुम्हारे ख्वाबों में आऊँ
कुछ यूँ सताऊँ
तुम्हारी नींद चुराऊँ
बेचैनी बढाऊँ…
तुम्हारा ख्याल बन जाऊँ
कोई अह्सास बन जाऊँ
हवा की तरह
हवा में मिल जाऊँ
तुम्हे छू जाऊँ
प्यार जताऊँ
कोई ओस की छोटी
बूँद बन जाऊँ
किसी फ़ूल की खुशबू ले
साँस में बस जाऊँ
कदमों की हल्की आहट बन जाऊँ

आसमाँ के नीचे
ज़मी से ऊपर
बादल के बीच तुम्हे बुलाऊँ
तुम्हे बादल बनाऊँ
थोडी आवारा बन जाऊँ
कुछ बावरी हो जाऊँ

आसमाँ के नीचे
ज़मी से ऊपर
बादल की तरह उडती जाऊँ
तुमसे मिल जाऊँ

बरस जाऊँ ....
तरस जाऊँ.....

........

तुम्हारे ख्वाबो में आऊँ…

Wednesday, March 28, 2007

सुन मेरे मन...

हाथ छुडा रहा है कब से…
तू जा...

तेरी मंजिल वहाँ….
रास्ता हो जहाँ….

हवा के आगे...
लम्हों के पीछे....

तू जा....

भटकता हुआ..
अटकता हुआ..

संवरता हुआ...
संभलता हुआ...

फिसलता हुआ...
सिमटता हुआ...

तू जा...

भंवर जले तो भी क्या...
बवंडर उठे तो भी क्या...
लौ बुझे तो भी क्या....
आग लगे तो भी क्या...

तू जा....

अनुभूति का ऋण...
अभिव्यक्ति की सजा...
अनुरक्ति की उम्र...
सब भुला...

तू जा...

उलझते हुए..
सुलझते हुए...
सुलगते हुए...
झुलसते हुए....

तू जा...


पिघलना नहीं...
रूप ढ़लना नहीं...
बदलना नहीं....
बिखरना नहीं...
चलाचल...जा...

तू जा…

कोई रोके कहीं…
ठोके कभी….
शास्त्र में झोंके यहीं...
मात्र हो तो भी क्या....

तू जा....

सच पर सरकते हुए...
लुढ़कते हुए...
खिलखिलाते हुए....
रुलाते हुए

तू जा....

छोड़ कर मेरा घर...
भटक दर बदर...

तू जा...

यूँ ही हठ कर मचल...
कर मुझे भी विकल...
पल पल हलचल...
ना नियम का अमल...
सँभल !!!

क्यों बेचैन है...
कौन मंजिल कहाँ...
रास्ता धुन्ध में….
यह कैसी पहल....!!

ओ भ्रमित...
आधीन तू...
सवाधीन कब...
सुन!! आ जा....


आँचल में आ...
सो जा....

Thursday, March 22, 2007

प्रयत्न

उठ सको तो उठो अपने कद से ऊपर...
आरज़ू की सतह पर..अरमां को छूकर..
झुक सको तो झुको अहँकार के नीचे...
भूत के आगे...भविष्य के पीछे....
कह सको तो कहो सच आत्मा से...
ना बैसाखी भावों की...ना सहारा शब्दों से...
बुन सको तो बुनो ख्वाब हकीकत से....
कुछ पसीने से कुछ परिश्रम से.....
भेद सको तो भेदो अँधकार...
जैसे उजाला सूराख से होता है पार...
दे सको ध्वनी तो दो बेबसी को...
गालों पर गिरते आँसू की आहट को...
लिख सको तो लिखो कुछ ऐसा रूह पर..
कि स्याही इसकी ना हो शऱीर सी नश्वर..

जोड़ सको तो जोड़ो...
आज से..
कल को कल से..
पल को पल से...
सच को ख्वाब से...
सवाल को जवाब से...
भावना को सोच से...
जिद को समझ से....

है श्रद्धा तो आओ...
कुछ यह लीला भी बूझो...
बुलबुले में कैद इन्द्रधनुष....
जुगनु में कैद रोशनी...
छुईमुई की लाज....
और कोयल का साज़...

महसूस कर सको तो करो उस खुदा को...
साँस लेती हुई हर सदा को...
खामोश सी हर उस अदा को...
अहसास से जुड़ी भावना को...
रंगों को....रागों को....

कर सको तो करो समर्पण....
तन को...मन को....और रूह को...
अंदाज़ को...आवाज़ को....और अरमान को....

खुद को...खुदाई को....और अपने खुदा को....

Monday, March 12, 2007

अन्तरदृष्टि

कोई ध्वनि नहीं
प्रतिध्वनि कैसी......?

बिम्ब बिना
यह प्रतिबिम्ब कैसा....?

मेरे शब्दों में
प्रतिलिपि किसकी….?

निष्क्रियता पर
प्रतिक्रिया कहाँ से.....?

रूप में
प्रतिरूप किसका....?

रूह के अनूकूल
राहें प्रतिकूल कैसे...?

ना हो कर भी
कौन है....?
कुछ कह कर भी
मौन है.....!!

Friday, March 02, 2007

रंग दे पिया

तुमसे होकर गुजर जाने दो
रंगो में बिखर जाने दो

बिखरे हुए रंगो को
अंग से लिपट जाने दो

मेरे सपनों के खाको में तुम
पक्के रंगो को चड जाने दो

अपने ख्वाबो की रेखाओ में
मुझको सिमट जाने दो

सूरज की लाली से आज...
टेसू का रंग लाकर दो....

नीले गगन से मुझे...
रंगीन बदली चुराकर दो...


छूकर मुझे पलकों से...
थोड़ा पिघल जाने दो....

चाहत में तेरे मुझे...
थोड़ा सुलग जाने दो...

धुँधले धुंए में जरा ...
रंग से रंग मिल जाने दो....

थोड़ा सँवर जाने दो...
मुझको निखर जाने दो....

थोड़ा भिगो दो मुझे....
थोड़ा निचुड़ जाने दो...

तेरे आगोश में मुझको....
नये रंगो में रंग जाने दो....