हाँ अभी भी वहीं टंगा है वह ख्वाब
...क्षितिज पर...
....पता तो यहीं का था...
....पर कहाँ है यह क्षितिज....
...कहाँ मिलते हैं..
...ज़मीं आसमाँ....
फिर कोई भ्रम होगा.....
...आँखे खोल कर भी सपने देखने लगी हूँ....
कल चाँद को झाडियों में अटके हुए देखा था.....
बादलों को आसपास भटके हुए देखा था....
होश में रहने की आदत छूट गई है...
मदहोशी में हर ख्वाब सच लगता है....
क्या उसकी आँखों में सचमुच कोई बूंदे थी...
माथे पर शिकन की लकीरें थी....
फिर कोई भ्रम होगा.....
...आँखे खोल कर भी सपने देखने लगी हूँ....
ऐडियों से थोड़ा ऊँचा उठकर....
टाँगा था वह सपना क्षितिज पर...
कुछ सलवटें जो मेरी कोहनी से पड़ी थी आसमाँ पर...
उन्हे बादल से ढ़क आई थी...
कल तो पहुँच गई थी आसमाँ तक....
आज यह क्षितिज भी बहुत दूर लगता है....
न जाने...कहाँ मिलते हैं..
...ज़मीं आसमाँ....
फिर कोई भ्रम होगा.....
...आँखे खोल कर भी सपने देखने लगी हूँ....
अब भी दिख जो रहा है.....
अभी भी वहीं टंगा है .....
वह ख्वाब……
...क्षितिज पर...
...क्षितिज पर...
....पता तो यहीं का था...
....पर कहाँ है यह क्षितिज....
...कहाँ मिलते हैं..
...ज़मीं आसमाँ....
फिर कोई भ्रम होगा.....
...आँखे खोल कर भी सपने देखने लगी हूँ....
कल चाँद को झाडियों में अटके हुए देखा था.....
बादलों को आसपास भटके हुए देखा था....
होश में रहने की आदत छूट गई है...
मदहोशी में हर ख्वाब सच लगता है....
क्या उसकी आँखों में सचमुच कोई बूंदे थी...
माथे पर शिकन की लकीरें थी....
फिर कोई भ्रम होगा.....
...आँखे खोल कर भी सपने देखने लगी हूँ....
ऐडियों से थोड़ा ऊँचा उठकर....
टाँगा था वह सपना क्षितिज पर...
कुछ सलवटें जो मेरी कोहनी से पड़ी थी आसमाँ पर...
उन्हे बादल से ढ़क आई थी...
कल तो पहुँच गई थी आसमाँ तक....
आज यह क्षितिज भी बहुत दूर लगता है....
न जाने...कहाँ मिलते हैं..
...ज़मीं आसमाँ....
फिर कोई भ्रम होगा.....
...आँखे खोल कर भी सपने देखने लगी हूँ....
अब भी दिख जो रहा है.....
अभी भी वहीं टंगा है .....
वह ख्वाब……
...क्षितिज पर...



