Sunday, April 29, 2007

आभास

हाँ अभी भी वहीं टंगा है वह ख्वाब
...क्षितिज पर...
....पता तो यहीं का था...

....पर कहाँ है यह क्षितिज....
...कहाँ मिलते हैं..
...ज़मीं आसमाँ....

फिर कोई भ्रम होगा.....
...आँखे खोल कर भी सपने देखने लगी हूँ....

कल चाँद को झाडियों में अटके हुए देखा था.....
बादलों को आसपास भटके हुए देखा था....

होश में रहने की आदत छूट गई है...
मदहोशी में हर ख्वाब सच लगता है....

क्या उसकी आँखों में सचमुच कोई बूंदे थी...
माथे पर शिकन की लकीरें थी....

फिर कोई भ्रम होगा.....
...आँखे खोल कर भी सपने देखने लगी हूँ....


ऐडियों से थोड़ा ऊँचा उठकर....
टाँगा था वह सपना क्षितिज पर...
कुछ सलवटें जो मेरी कोहनी से पड़ी थी आसमाँ पर...
उन्हे बादल से ढ़क आई थी...

कल तो पहुँच गई थी आसमाँ तक....
आज यह क्षितिज भी बहुत दूर लगता है....
न जाने...कहाँ मिलते हैं..
...ज़मीं आसमाँ....



फिर कोई भ्रम होगा.....
...आँखे खोल कर भी सपने देखने लगी हूँ....

अब भी दिख जो रहा है.....
अभी भी वहीं टंगा है .....
वह ख्वाब……
...क्षितिज पर...

Thursday, April 26, 2007

बड़ी हो गई हूँ.....

एक और परत…

आ गई है मुझ पर...

मैं और सयानी हुई हूँ.....

आज माँ तेरी बेटी मैं...

और बड़ी हो गई हूँ.....


तूने पकड़ा था झूठ मेरा...

अब तो सयानी हो गई हूँ....

खुद से भी बोलूँ जो झूठ...

पकड़ नहीं पाती हूँ....

आज माँ तेरी बेटी मैं...

और बड़ी हो गई हूँ.....



इतने परतों के नीचे...

कैसे ढूँढेगी मुझको.....??

बस आँखो से झाँकोगी तो..

झलक दिखेगी शायद...

बाकी तो अब मैं …

बहुत बदल बदल सी गई हूँ..

आज माँ तेरी बेटी मैं...

और बड़ी हो गई हूँ.....



रात में जब सोया करती हूँ...

सपने वही आते हैं....

पापा अब भी मेले से....

खिलौने ले आते हैं....

तेरी खुशबू से माँ अब...

दूर बहुत हो गई हूँ....

आज माँ तेरी बेटी मैं...

और बड़ी हो गई हूँ.....



आँचल के कोने पर बच्चे..

लटक झटक कर दौडे…

आईने में देखा खुद को....

लगा तुझको देखा हो....

अब तो मैं भी माँ बिल्कुल...

तेरी जैसी हो गई हूँ....

आज माँ तेरी बेटी मैं...

और बड़ी हो गई हूँ.....

Saturday, April 14, 2007

संजोना है...

छोटी छोटी यादों को...
माला में पिरो दूँ मैं ...
मोती की तरह...
सीपी में छिपा दूँ मैं ...
फूलों की बहारो में ...
ओस सा सजा दूँ मैं ...
तेरे मेरे आँखो की...
चमक में बसा दूँ मैं ...

तू कहे तो…इन बूँदों को...
सागर से बढा दूँ मैं ...
सावन में बरसा दूँ ...
झरने में गिरा दूँ मैं ...
सरगम की रागों में ...
रंगों की महफ़िल में...
आँछल के तारों में ...
गोदी में छिपा दूँ मैं...

स्पर्श की नर्मी में ...
आलिंगन की गर्मी में...
तेरे स्वर में …मेरे शब्दों में ...
छोटी छोटी यादों को...
माला में पिरो दूँ मैं ...

Monday, April 09, 2007

हवा मैं…

चली चली ..
रेत पर टीले बनाते हुए...
लहर से तट पर चित्र बनाते हुए...
बादलों के ढेलों को गूंदती हुई....
फिरकी को गोल घुमाते हुए....


चली चली....
आँछल को लहराते हुए....
बुदबुदाते हुए...गुदगुदाते हुए....
कागज़ की नाव को चलाते हुए..
जामुनों की बारिश कराते हुए...

चली चली...
लाल बेरी को ज़मीं पर बुलाते हुए...
सूखे पत्तों की सरसराहट से धुन बनाते हुए.....
नन्ही अमिया को ड़ाली से छुड़ाते हुए...
झाड़ की छाया को झुलाते हुए….

चली चली...
बारिश के छींटों को छिड़कते हुए....
फूलों के गुच्छों पर झूमते हुए...
पत्तियों के संग खिलखिलाते हुए...
कलियों के संग लजाते हुए....

चली चली....
रसोई से रोटी की खुशबू उड़ाते हुए...
मां के हाथों के जादू को महकाते हुए...
गीले पापड़ को होड़ में सुखाते हुए...
मटकी में ठंडक मिलाते हुए...


चली चली....
कभी सुस्त...कभी चुस्त....हो मस्त चली

Thursday, April 05, 2007

युगल

अपेक्षित...
प्रतीक्षित निर्जीव
निःशब्द…
खड़ी मैं….

स्पर्श जो...
तेरे साँस का...
जीवित करे...


यूं ही...
बाँसुरी में लीन..
मूक...
अस्तित्व को...
फूँक कर....
दे धवनि …

चल चले साथ में...
साँस के साज में...
उनमुक्त...

सृष्टी में...
तरंग बन....
जीवन्त एक कण....

तू और मैं....

Tuesday, April 03, 2007

आग्रह

इक बार फिर से मुझे
मेरी तस्वीर दिखला दो...
बदल कर पहनते पहनते...
कई चेहरे....
भूली कैसी दिखती थी कभी...

अब भी उठती है आवाज़..
पहचानी सी...
जाने किस शोर में ...
गुम यह जाती है....

भुलाना चाहती हूँ
हर सीख ज़माने की...
...बस...
...मेरा निष्कलंक रूप मुझे
लौटा दो....

...मेरी मासूमियत….
मेरा विश्वास...
....आस...
मेरी प्यास..
...खो गये हैं कहीं....

..मेरी राह...
...उत्साह....
...मेरे ख्वाब...
...मेरे पँख....
...मुझे लौटा दो...


इससे पहले कि
भूल जाऊँ खुद को मैं....
मुझे...मुझसे इक बार फिर...
मिल लेने दो...

इक बार फिर से मुझे...
मेरी तस्वीर दिखला दो...

………………….
तबाही के सही आँकड़े...
दर्ज करवा दूँ....
..............
अपनी तस्वीर...
फ्रेम करवा लूँ....