कैसे पकड़ोगे मुझको…?
कैसे बाँधोगे मुझको…?
मैं भी तो जानूँ...!!
तुम कहो......
कहो ना....
थोड़ी आवारा हूँ मैं...
थोड़ी बंजारा हूँ मैं...
संग संग जो बहना चाहो...
तो बहो...
.
बहो ना....
आती जाती बहारें...
बहो ना....
आती जाती बहारें...
जानी अनजानी राहें...
मेरे साथ उड़ना चाहो
तो चलो....
चलो ना....
पतझड़ की शाखों में
कुछ नये पत्ते लगा दें…
यादों की डिब्बियों में…
कुछ पल तुम भी बंद कर लो...
कर लो ना....
उलझी उलझी सी हूँ मैं...
बहकी महकी भी हूँ मैं....
लड़खड़ाती मदहोशी भी....
अब भी तुम बाँधोगे क्या....??
कहो ना....
ऐसे पकड़ोगे मुझको…?!!
ऐसे बाँधोगे मुझको…?!!
यूँ तो मैं बँध जाऊँगी....
तुम में ही खो जाऊँगी.....
हो ना हो....
तुमने जो पँख लगाये....
मुझपर जो रंग चड़ाये....
और उँचा उड़ने लगी हूँ..
यह पहेली कैसी.....
बूझो ना.......



