Wednesday, June 27, 2007

बहीखाता

हिसाबों की किताब
लगी हाथ में....
देखा तो था बहीखाता
जिन्दगी का लिखा....

थोड़ी जिन्दगी उधार मे लेकर
आई यहाँ रोते हुए....
मैं चुकाती गई कर्ज़ा…
.....बचे पर...
ब्याज़ चड़ने लगा...

कुछ पलों को कमाया...
उन्हे बेफिक्री में लुटाती चली....
उनमें से थोड़े बचाकर..
किताबों में उनको सुखा कर रखे....

ब्याज़ उधार से भी
ज्यादा हुआ....
आने वाले कल ...
गिरवी रखे....


उघार के पल और
कितने बचे...
हिसाबों में कितने
लम्हे फँसे....

मेरे उनमुक्त पल
कहाँ हैं पड़े......??
कटघरे में ….
और कितने लम्हे खड़े??

Tuesday, June 19, 2007

तू ही बता दे जिन्दगी...

ख्यालों के जंगल में...
पगडंडी दिखेगी क्या??

सवालों के समंदर में...
कोई मोती मिलेगा क्या??

जज़्बात की ऊँचाई पर....
अहम झुकेगा क्या??

यादों की झोली में.....
बचपन का दोस्त मिलेगा क्या??


कहाँ हैं चिन्ह.....
किस ओर है छोर....
कहाँ से सिमटेगी जिंदगी....


ना गुजरे में....ना आने वाले में....
इस पल में जी सकूँगी क्या?

उधेड़ कर बुन....बुन कर उधेड़...
इस उलझन से ऊपर उठूँगी क्या....?

साँसों की ड़ोर...सुलझेगी या….
उलझ कर फिर....अटकेगी या...
किसी सपने के पीछे ये ….
चगेगी क्या....
चढ़ेगी क्या ??

Monday, June 18, 2007

तेरे लिये

मेरी गोदी में
रात छिपी है....
तुझको सुला दूँ मैं.....

मेरी पलकों में
आस रुकी है...
तुझको मिला दूँ मै

तेरे शिकन की
सारी लकीरें!
आज मिटा दूँ मैं….

तेरी पलको के
सायों में सपने...
लाकर बिठा दूँ मैं.....

आँसू से कैसे...
इरादें हैं बुनने....
आजा सिखा दूँ मैं....

तेरी पतंग....
गर बादल से उलझे....
....नभ भी झुका दूँ मैं.....