Tuesday, July 31, 2007

गर्मी के दिन

भोर से पहले
खिड़की पर आकर
पर्दे के पीछे से झाँके

फिर थक हार कर
रेत पर सोना बिछा कर
सुस्ताये

उठ आलसी!!
पश्चिम में जाकर
साँझ बिछा आ.....

राह तकती हूँ पी की...
उनको बुला ला....

Thursday, July 26, 2007

सुबह लाई जिन्दगी

थोड़ी चाय में उबाल लूँ
चुस्कियों में उभार दूँ...
नास्ते में खिला दूँ
रास्ते के लिये बाँध दूँ

धीमी आँच पर थोड़ी
गर्म कर लूँ ठंडी जिन्दगी...
चूल्हे में फुला दूँ...
सिमटी पड़ी जिन्दगी...

समय के तारों से उतार लूँ
सूखी जिन्दगी....
तह कर सँभाल लूँ
सलवटों से सजी जिन्दगी....

पल्लू के कोनों पर बाँध लूँ
थोड़ी जिन्दगी....
बचपन के हाथ में खोल दूँ ...
सारी बन्दगी....

मरी आत्माओं के बीच
ओढ़ लूँ थोड़ी जिन्दगी...
उमंगों की तरफ मोड दूँ
बहती हुई यह जिन्दगी...

लोरियों के बीच
सुला दूँ तुझे जिन्दगी...
सुबह के साथ आना
फिर बुलाने मुझे जिन्दगी

Wednesday, July 11, 2007

क्या लाये पिया...??

सिंदूरी शाम से थोड़ा
सिंदूर ले आते
बादल के झोले से
नमी ले आते
हवा से तितलियों के
पदचिन ले आते
मेरे गाँव से थोड़ी
बारिश ले आते
बाबुल की खिड़की से
बूंदों की माला ले आते
पलों को संजोने कोई
ताला ले आते...


थोड़ा सावन ले आते
कोई खिलौना....
मनभावन ले आते...

लाये हो...
आफिस की बातें
आधी अधूरी....
खाने का डिब्बा,
फाइलें जरूरी
…..

कितने बहाने बनाती
तुम्हारी चुप्पी है,
पलकों के कोनों में
शरारत भी छुपी है,
........
साथ में
भावनायें तो है,
शाम में और
संभावनायें तो है...।

Sunday, July 08, 2007

अड़ियल फीकापन

फीकी तकदीर देखी तो
सोचने लगी कैसे रंग भरूँ इनमें
पहली सी दिखे तस्वीर,
ऐसा क्या करूँ इनमें ?

रंगों को लेकर आई,
तो जाना;
ऐसे रंगते नहीं तकदीरों को.....

कोई दीवार तो नहीं,
हर साल नया रंग दूँ;
...ऐसे बदलते नहीं तस्वीरों को....

Monday, July 02, 2007

हैरान हो ??

उसकी आँखों में कब तक तलाशोगे खुद को……??
इन रास्तों में कब तक भटकोगे बेसुध हो…..??


उसने दिया सो अनमोल है...फिर चाहे गम हो...
बस इतनी जिद कि उसकी आँखे भी नम हो....


उसकी खुशबू महके ऐसा कोई तो उपवन हो...
तेरे नाम की उसकी एक तो धड़कन हो...


जज़्बात से उसको भी कभी उलझन हो...
खामोशी में उसको भी कभी घुटन हो....


यूँ हैरां हो कि कैसे वो जिये यूं सहज हो....
जब कि तेरे सारे पलचिन पानी पर निशां महज हो.....