ऐ लौ
हवा को इस कदर
महसूस न कर
रोशनी को यूँ
बेकरार न कर
कहीं ये
हस्ती तेरी मिटा ना दे
बस्ती तेरी जला ना दे
Wednesday, August 29, 2007
Tuesday, August 28, 2007
टूटा तारा
यह रेत यूं ही चमक रही है
या कोई सितारा जमीं पर उतरा है?
किसकी ख्वाईश के खातिर आखिर
ये यूँ टूट कर बिखरा है?
या कोई सितारा जमीं पर उतरा है?
किसकी ख्वाईश के खातिर आखिर
ये यूँ टूट कर बिखरा है?
Thursday, August 23, 2007
संवाद
तेरे मन का वेग
तेरे शब्दों से कितना अधिक है
इसके आशय
कितने स्पष्ट हैं
मेरी नि:शब्दता में
तुम अपने शब्दों के उत्तर खोज रहे हो ?
जबकि मेरे चित्त में
तेरे सब सवालों के जवाब हैं
तेरे शब्दों से कितना अधिक है
इसके आशय
कितने स्पष्ट हैं
मेरी नि:शब्दता में
तुम अपने शब्दों के उत्तर खोज रहे हो ?
जबकि मेरे चित्त में
तेरे सब सवालों के जवाब हैं
Monday, August 20, 2007
चुपके से
थोड़ी रात बचा कर रखी थी
बिछा आई
डिब्बी से तारे निकाले
लगा आई
बोतल से थोड़ी बारिश
थके चेहरे पर छिड़क आई
उँगली पकड़
दामन में चली आई
सपनों की लोरी सुना
नींद सुला आई
अरमानों को पलकों से पकड़
सिटकनी चड़ा आई....
बिछा आई
डिब्बी से तारे निकाले
लगा आई
बोतल से थोड़ी बारिश
थके चेहरे पर छिड़क आई
उँगली पकड़
दामन में चली आई
सपनों की लोरी सुना
नींद सुला आई
अरमानों को पलकों से पकड़
सिटकनी चड़ा आई....
Thursday, August 16, 2007
कायदा
बादल की पलकों से चाहो तो उतार लो
छत की मुंडेर पर आकर समेट लो
सिंकुड़ति छाँव में बंद कर पकड़ लो
टपकती बूंदों की आवाज़ में सुन लो
बंद आँखों के भीतर धीरे से खोलो
सिरहाने रख चाहो तो सो लो
बस कैद करना नहीं मुझको तुम...
मेरे अहसासों के संग चाहो तो बँध लो
Sunday, August 12, 2007
तुम्हारा इन्तज़ार है
(पन्द्रह साल पहले लिखी एक कविता)
कब से जुगनुओं के पीछे हूँ
उन्हे पकड़ मुट्टी में रख
उनसे वफाओं के वादे करती हूँ
और जब विश्वास से मुट्टी खोलती हूँ
जुगनू मुझे छोड़
अपनी रोशनी ले
दूर उड़ जाता है
कुछ देर पीछे भागती हूँ
फिर यह सोच कि यह तो
उसकी अपनी रोशनी है
रुक जाती हूँ
कहाँ हो तुम
मेरी रोशनी?!
सायों के अँधेरों में अपने
संदेशों को खोजती हूँ
अंदेशों को ढूँढ़ती हूँ
भावनायें
संभावनायें
फिर जैसे सब उस अँधेरे में खो जाता है
उन सायों की धुँधली लकीरें मिट जाती हैं
और होता है एक घना अँधेरा
क्या तुम तन्हा नहीं?
तुम्हे मेरी आरज़ू नहीं?
क्या तुम बेताब नहीं?
हवा पर कान लगा कर हर सन्नाटे को सुनती हूँ
शायद तुम्हारी आहट सुनाई दे
सागर के किनारे हर पदचिन को देखती हूँ
शायद कोई तुम्हारा हो
पर वो लहरें
न जाने क्यों
हर निशां मिटा चली जाती हैं
कितनी बार अरमानों के चौकट पर आ
लौट जाती हूँ
हर सदा को
तुम्हारी पुकार समझ जवाब देती हूँ
और तुम ना जाने कहाँ हो
हर बात से बेखबर
अपनी मंजिल से अनजान
निर्मोही,निष्ठुर
कितने सपने संजोये खड़ी हूँ मैं
.....
तुम और तुम्हारे साथ मैं
मेरी अंजली में तुम्हारा स्पर्श
दिवानापन, विश्वास ,हर्ष
लम्हों का मंदिर
यादों का मंजर
तेरे लिये मैं…
रागिनी
दामिनि
शालिनि
संजीवनी
पर…
अब यह इंतज़ार
तुम्हारी बेरुखी
ख्वाईश
सही नहीं जाती
कोई गुमनाम दास्ताँ सुना
जब हौले से निशा सुला जाती है
तब ख्वाबों में तुम्हारी जानी पहचानी सी
धुँधली सी तस्वीर
और उसे साफ देखने की मेरी कोशिश
सही नहीं जाती
किस तरह पुकारूँ तुम्हे?
किन वर्तमान के पन्नों को पलटूँ?
कौन सा रास्ता?
कौन सी पगडंडी?
किस पेड़ की छाया के नीचे सुस्ताऊँ?
अब यह सवाल
और उनके जवाब ढूँढ़ने की चेष्ठा
सही नहीं जाती
वर्तमान के कँधों पर चड़
भविष्य को छू सकूँ
क्या ऐसा हो सकता है?
मालूम नहीं!!
पर अब यह अधूरापन
एक हमसफर की जरूरत
सही नहीं जाती
कहाँ हो??!
चले आओ
उन भटके हुए
भविष्य की राहों को छोड़
मेरे पास
वर्तमान में…
तुम्हारा इंतज़ार है......
कब से जुगनुओं के पीछे हूँ
उन्हे पकड़ मुट्टी में रख
उनसे वफाओं के वादे करती हूँ
और जब विश्वास से मुट्टी खोलती हूँ
जुगनू मुझे छोड़
अपनी रोशनी ले
दूर उड़ जाता है
कुछ देर पीछे भागती हूँ
फिर यह सोच कि यह तो
उसकी अपनी रोशनी है
रुक जाती हूँ
कहाँ हो तुम
मेरी रोशनी?!
सायों के अँधेरों में अपने
संदेशों को खोजती हूँ
अंदेशों को ढूँढ़ती हूँ
भावनायें
संभावनायें
फिर जैसे सब उस अँधेरे में खो जाता है
उन सायों की धुँधली लकीरें मिट जाती हैं
और होता है एक घना अँधेरा
क्या तुम तन्हा नहीं?
तुम्हे मेरी आरज़ू नहीं?
क्या तुम बेताब नहीं?
हवा पर कान लगा कर हर सन्नाटे को सुनती हूँ
शायद तुम्हारी आहट सुनाई दे
सागर के किनारे हर पदचिन को देखती हूँ
शायद कोई तुम्हारा हो
पर वो लहरें
न जाने क्यों
हर निशां मिटा चली जाती हैं
कितनी बार अरमानों के चौकट पर आ
लौट जाती हूँ
हर सदा को
तुम्हारी पुकार समझ जवाब देती हूँ
और तुम ना जाने कहाँ हो
हर बात से बेखबर
अपनी मंजिल से अनजान
निर्मोही,निष्ठुर
कितने सपने संजोये खड़ी हूँ मैं
.....
तुम और तुम्हारे साथ मैं
मेरी अंजली में तुम्हारा स्पर्श
दिवानापन, विश्वास ,हर्ष
लम्हों का मंदिर
यादों का मंजर
तेरे लिये मैं…
रागिनी
दामिनि
शालिनि
संजीवनी
पर…
अब यह इंतज़ार
तुम्हारी बेरुखी
ख्वाईश
सही नहीं जाती
कोई गुमनाम दास्ताँ सुना
जब हौले से निशा सुला जाती है
तब ख्वाबों में तुम्हारी जानी पहचानी सी
धुँधली सी तस्वीर
और उसे साफ देखने की मेरी कोशिश
सही नहीं जाती
किस तरह पुकारूँ तुम्हे?
किन वर्तमान के पन्नों को पलटूँ?
कौन सा रास्ता?
कौन सी पगडंडी?
किस पेड़ की छाया के नीचे सुस्ताऊँ?
अब यह सवाल
और उनके जवाब ढूँढ़ने की चेष्ठा
सही नहीं जाती
वर्तमान के कँधों पर चड़
भविष्य को छू सकूँ
क्या ऐसा हो सकता है?
मालूम नहीं!!
पर अब यह अधूरापन
एक हमसफर की जरूरत
सही नहीं जाती
कहाँ हो??!
चले आओ
उन भटके हुए
भविष्य की राहों को छोड़
मेरे पास
वर्तमान में…
तुम्हारा इंतज़ार है......
Thursday, August 09, 2007
Monday, August 06, 2007
सौगात
मुट्टी खोलो
ये लो
एक ओस की बूंद
संग सात रंगों की सेना
उस रिमझिम बरसात की याद
उस खिले धूप की मीठी चुभन
उस महके फूल की
जिसपर हँसा था ये
खिला था ये
गुलटियाँ खाकर
दौड़ते हुए
मेरी मुट्टी की आगोश में
दौड़ा चला आया था ये
उसकी खुशबू
इतना छोटा
पर कितना संपूर्ण
सावन की कहानियाँ
अपने में समेटे हुए
कोई भंवरे का स्पर्श लिए हुए
कहीं पराग को छुपाये हुए
सागर मेरी मुट्टी में नहीं समा सकता
मुट्टी खोलो
ये लो
एक ओस की बूंद
ये लो
एक ओस की बूंद
संग सात रंगों की सेना
उस रिमझिम बरसात की याद
उस खिले धूप की मीठी चुभन
उस महके फूल की
जिसपर हँसा था ये
खिला था ये
गुलटियाँ खाकर
दौड़ते हुए
मेरी मुट्टी की आगोश में
दौड़ा चला आया था ये
उसकी खुशबू
इतना छोटा
पर कितना संपूर्ण
सावन की कहानियाँ
अपने में समेटे हुए
कोई भंवरे का स्पर्श लिए हुए
कहीं पराग को छुपाये हुए
सागर मेरी मुट्टी में नहीं समा सकता
मुट्टी खोलो
ये लो
एक ओस की बूंद
Sunday, August 05, 2007
लम्हों की उम्र
कुछ लम्हे छूटे डाली से...
कुछ झूले हवा के झूले
कुछ बिखरे हैं...कुछ सिमटे हैं...
कुछ ठहरे नीचे क्यारी में..
कुछ पके..कुछ सूखे हैं...
कुछ गीले....
यह क्यों छूटे हैं??
कुछ झूले हवा के झूले
कुछ बिखरे हैं...कुछ सिमटे हैं...
कुछ ठहरे नीचे क्यारी में..
कुछ पके..कुछ सूखे हैं...
कुछ गीले....
यह क्यों छूटे हैं??
Thursday, August 02, 2007
शायद
शायद स्पर्श हवा में
घुल सकता है
पता लिख दो गर
तो पहुँच जाता है
नहीं तो कहो
ये कैसे हुआ
हवा छू गई
और लगा
पता लिख दो गर
तो पहुँच जाता है
नहीं तो कहो
ये कैसे हुआ
हवा छू गई
और लगा
तुम पास हो.....
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