Saturday, September 29, 2007

आदित्य


तेरे स्नेह के प्रकाश में
मैं अंकुरित हुई
एहसास के कोंपल खिले
मैं जीवित हुई
अनुराग में पली....
आस्था की कली
जडों को मज़बूत कर
मैं खड़ी हुई
तेरे सम्मुख
तुझे निहार कर
मैं बड़ी हुई

Wednesday, September 26, 2007

आकांक्षा


रात को ओढ़ लूँ...
रात में खो चलूँ
रौशनी उतार कर
आज खुद से मिलूँ

प्रज्वलित हो चलूँ
आज खुद ही जलूँ
सूर्य बन कर उगूँ
आभा बन कर जगूँ

भस्म गर हो गई
बीज बन कर जियुँ
अंकुरित हो सकूँ
जिन्दगी बन सकूँ

स्वर के लय पर…
शब्द के आशय में...
स्नेह के अहसास में….
सोच के पँख पर….

एक तरंग बन सकूँ…
एक सदिश की तरह
चल सकूँ... छू सकूँ…
आज मैं...काश मैं...
मैं बन सकूँ

Sunday, September 23, 2007

महत्व

घने अँधेरों में
उजला सवेरा हो तुम...

तुम्हारे आने पर
साये साफ नज़र आते हैं

तुम चले जाते हो...
तभी साथ की
रोशनी का ख्याल आता है.....

Sunday, September 16, 2007

मन के पहरेदार

रिश्ते हैं रस्में हैं
वादें हैं कसमें हैं

अटकन है भटकन है
अनबन है उलझन है

ईसा है अल्ला है
पंडित है मौला है

बाईबल है, गीता है
राम है, सीता है

पर्दा है हिजाब है
हिसाब की किताब है

उपदेश हैं आवेश है
परिवेश हैं निवेश है

अनुभव है,परिभव है
संभव असंभव है

मन महज है
कितना असहज है

चतुर नहीं, मूर्ख है
शतुरमुर्ग है

पंख हैं....
हैं तो...
पर अपंग है

लगन नहीं है
गगन नहीं है

Wednesday, September 12, 2007

सौदा

समझ के हाथ
अपना आसमाँ छोड़ आई
अपने पैरों तले
कितनी ज़मीं...
नाप आई
अच्छे दामों में
क्षितिज बेच आई

Tuesday, September 11, 2007

पारदर्शी

मेरे स्नेह को
अपने हृदय से
यूं प्रेषित करते हो
कि तुम्हारी आँखों में भी
कोई अपवर्तन नहीं...
मैं ...
मैं ही नज़र आती हूँ

Thursday, September 06, 2007

सवेरा



इक सिरा रात का तुम पकड़ो,इक मैं
आ रात को पलट आये,सुबह बुला लायें

थोड़ा तुम हाथ लगाओ, थोड़ा मैं
घिरनी के सहारे सूरज चढ़ा आये

तुम पीछे चलो, आगे मैं
बादल बिखेर आयें, चाँदनी समेट आये

रेत पर बिखरे सपनों को बीन लूँ मैं
फिर सागर के बुलबुले बना आयें

पहले तुम छू लो, फिर मैं...
बच्चों की अंगड़ाई से जादू उठा लायें

जिन्दगी के साथ तू, तेरे साथ मैं
रौशनी उगा आयें....








Tuesday, September 04, 2007

अपेक्षा

अपेक्षा
जंगली घास की तरह
उग आती है
रिश्तों के बीच
जगह बना लेती है
स्नेह से रिक्त स्थान पर
टिक जाती है

तुम सोचते हो
सींचते हो
फिर भी जिन्दगी
हरी क्यों नहीं
जिन्दा पलों से
लदी क्यों नहीं

सूत्र पुराना ही है
बेहतर फसल
के खातिर
घास खींचनी होगी
काटनी होगी