Wednesday, October 31, 2007

युगल


सोती हुई साँसों को
आगोश मे बाँध कर
सुलगती हवा से फूँका
जगा दिया.....
जला दिया....

ठोस अस्तित्व
पिघल गया
सरल हुआ
तरल हुआ

मूक एहसास
बोलने लगे
शब्द के बिना
राज़ खोलने लगे

आग भी
साँस भी
आस भी
प्यास भी
साथ मिलते गये
प्यार बनते गये

Sunday, October 28, 2007

मेरी बिटिया


आज हमारी बिटिया का जन्मदिन है। हम सभी प्यार से उसे गुड़िया बुलाते हैं।आज वह पाँच साल की हो गई । मेरा बेटा अक्सर उस से कहता है....जब तक गुड़ हो गुड़िया रहोगी नहीं तो बैड़िया बुलायेंगे।




मैने जिंदगी को बुलाया
तू चली आई
उदर में नये एहसास बनकर
नटखट सी मन की
कोई हलचल सी...

बचपन की गलियों में गई
तू चली आई
रेत के महल बनाने को
समंदर मुट्टी में सँभालने को

मैने आईना मँगाया
तू संवर आई
मेरी अलमारी से रंग उठा भागी
मेरी छुन्नी की साड़ी ओढ़ कर बैठी

कैनवास पर जो तस्वीर
उतारने बैठी
कागज़ पर मुझे बना लाई
आसमान में बिठा आई

मुट्टी से अपनी आँखें मल मल कर
यूँ सोई...
मुझे मीठे सपने दिखा लाई
मेरे कँधों पर लार गिराती गई
मुझे ममता से भिगो आई

अपने आँखों के मोती
मेरे आँछल में जड़े
मेरी गोदी में आस्था रख कर
मुझे अपना भगवान बना आई

मैने जिंदगी को बुलाया
तू चली आई


सीमा


समंदर की तरह
मुझे भी किनारा चाहिये
जिसके छोर पर
सपनों की झालर
बुन सकूँ
लहरों की तरह...
ऊपर उठ सकूँ
मचल सकूँ....
गहराइयों में खुद के
डूब कर
उतर सकूँ....
गुजरे लम्हों के दर्द को
मन के मोती से
रख सकूँ

समंदर की तरह
मुझे भी सीमा चाहिये
ताकि अपने अस्तित्व का
किनारों से पकड़
विस्तार कर सकूँ
बिखरने से बच सकूँ
फिर से सिमट सकूँ
अपनी पहचान की
पराकाष्ठा तक पहुँच सकूँ...
...चाहूँ तो सीमा में फिर सिंकुड़ सकूँ...

Wednesday, October 24, 2007

विघटन



सुबह होते ही
अस्तित्व बँट जाता है
थोड़ा खुद में
थोड़ा सायों में
सिमट जाता है
कभी इसका मैं
कभी मेरा यह
पीछा करता है
….
कभी अँधेरों में
हाथ थामते हैं यह...
फिर उजालों में
जुदा होते हैं।

Sunday, October 21, 2007

ज्योति

उजालों की चाहत है गर
तो आग पालनी होगी...
दिये में...
लौ के साथ...
जोड़नी होगी...
खाक ना कर दे
उजालों के सपने....
थोड़ी सँभालनी होगी...
स्नेह से दिये के दायरों में
सींचनी होगी

Saturday, October 20, 2007

उड़ान

ज़रा देर क्या झपकी ली
ख्याल पँख पहन कर उड़ गये
कितने रास्ते
कहीं जाते हुए
यूँ ही
मुड कर रुक गये

कहते हैं
तुम आ जाओ
तो साथ चलेंगे
उन ख्वाबों के पीछे
जो नींद की पकड़ से
निकल गये

संदेहों के नन्हे पैर
ना जाने कब सँभल गये
सुस्ताई समझ के पीछे
इरादों में बदल गये

जाना कहाँ
किसको है क्यों
यह तो कुछ भी पता नहीं
उड़ान का मज़ा लूटने
पँख पहन कर उड़ गये

रास्ते अनजान है
पगडंडी बनाने निकल गये
मंजिलों की खोज में
मासूम इरादे निकल गये

कल्पना के विश्वास
के बारे में क्या कहें...
बंद कमरों के अँधेरों से
सूराख से निकल गये

सूर्य को देखा वहाँ से
सूर्य पकड़ने चल पड़े
रौशनी की तलाश में
आग के पीछे निकल गये

Wednesday, October 10, 2007

माप

अस्त के समय
सायों से
अनुमान लगाया था
कभी

हैरान हूँ
जो सामने आया
और पाया
कितना छोटा
कद है

Saturday, October 06, 2007

आर्द्रता

भरी धूप में
ओस की बूँद
टिकेगी
कब तक
ज़रा इसकी नमी को
रूह को
छू लेने दो

दुआ बन जाने दो
हवा में घुल जाने दो....

यहीं कहीं आसपास
समां में
बस जाने दो....