फुदकती फिसलती
चीं चीं सी चिड़िया
शीशे के सामने शोर करती हुई
अपनी ही छवि से
शिकायत कर रही है
कि वो अकेली क्यों है....
Friday, November 30, 2007
Thursday, November 29, 2007
संध्या

थोड़ा बावरा होता सूरज
बादल को
बाहों में भर आया
सोने की जरी वाली
छुन्नी ओढ़ा आया
बादल की आँखों में
चमक भर आया
नीले आसमानी गगन में
गश्त लगाते
सफेद वर्दी में रूई के गोले
उनसे आँख बचा कर
गुलाबी बदरी
क्षितिज फाँद
ले डूबा...
Wednesday, November 28, 2007
प्रवृति
लौ को छू कर
मन में वह सोचे
भीतर से ना जाने
कितनी गर्म है
बड़ा नासमझ है
इतना ना जाने
आग की सतह पर ही
गर्मी अधिक है....
मन में वह सोचे
भीतर से ना जाने
कितनी गर्म है
बड़ा नासमझ है
इतना ना जाने
आग की सतह पर ही
गर्मी अधिक है....
Tuesday, November 27, 2007
शरद
उछल कर नभ पर
फिर बदरी झरूँगी
तेरे मन की सतह पर
हिमकण बरसूँगी
थोड़ा धीमे...हौले हौले
आकर रुकूंगी
पके पुराने सूखे गलते
लम्हों पर रहूँगी
एक बार फिर से मन
निर्मल करूँगी
परतों के नीचे
जादू रचूँगी
मेरे पीछे
वसंत छोड़ जाऊँगी ....
फिर बदरी झरूँगी
तेरे मन की सतह पर
हिमकण बरसूँगी
थोड़ा धीमे...हौले हौले
आकर रुकूंगी
पके पुराने सूखे गलते
लम्हों पर रहूँगी
एक बार फिर से मन
निर्मल करूँगी
परतों के नीचे
जादू रचूँगी
मेरे पीछे
वसंत छोड़ जाऊँगी ....
Monday, November 26, 2007
अनुमान
यहाँ किनारे पर बैठ
मेरी तरफ
एक एक कंकड़ उछालते जाते हो
मैं उसे महसूस करते ही
हरकत में आ जाती हूँ
तरंगों की
उथलपुथल में संवर जाती हूँ
तुम शायद मेरी
गहराई मापना चाहते हो....
मेरे अंतर्मन की आवाज़
ध्यान से सुनते हो...
उठते हुए बुलबुलों को देख
अंदाज़ा लगाते हो
डूबते कंकड़ो की
तपाक सी आवाज़ सुनना चाहते हो
मेरी तरफ
एक एक कंकड़ उछालते जाते हो
मैं उसे महसूस करते ही
हरकत में आ जाती हूँ
तरंगों की
उथलपुथल में संवर जाती हूँ
तुम शायद मेरी
गहराई मापना चाहते हो....
मेरे अंतर्मन की आवाज़
ध्यान से सुनते हो...
उठते हुए बुलबुलों को देख
अंदाज़ा लगाते हो
डूबते कंकड़ो की
तपाक सी आवाज़ सुनना चाहते हो
....................................
आवाज़ तो आई नहीं
गहराई कितनी है.....?!
आवाज़ तो आई नहीं
गहराई कितनी है.....?!
Saturday, November 24, 2007
दिन रात
सुबह ही
मेरे हाथ
धूप लग गई
मैने जल्दी से
खिड़की से
अंदर उतारी
सारा दिन
उसकी रोशनी में
खुद को देखती रही
कुछ ठंडे
पड़ते अरमां
मेरे हाथ
धूप लग गई
मैने जल्दी से
खिड़की से
अंदर उतारी
सारा दिन
उसकी रोशनी में
खुद को देखती रही
कुछ ठंडे
पड़ते अरमां
सेंकती रही
बड़े लगाव से
पकड़ कर
रखी थी
....ना जाने क्यों
दिन ढल गया
बड़े लगाव से
पकड़ कर
रखी थी
....ना जाने क्यों
दिन ढल गया
Wednesday, November 21, 2007
जिद
बुलबुलों में जिन्दगी
फूँखने की जिद है
इन्द्रधनुष को आसमाँ में
रोकने की जिद है....
बदलते मौसमों की
मनमानी बहुत हुई
अब इन मौसमों के मिजाज से
निपटने की जिद है
आस में पास में राख में खाक में
रेंगती हुई जिन्दगी
पँख लगा कर आज
उड़ाने की जिद है
पल पल लम्हा लम्हा
सिमटती हुई जिन्दगी
ओर छोर पकड़ कर
फैलाने की जिद है
बीमार घुटन सी
दम तोड़ती यह बंदिशे
इन बेडियों को झटक कर
खड़े होने की जिद है
उन्मुक्त गगन से
आँख मिला कर
खुली हवा में
साँस लेने की जिद है...
फूँखने की जिद है
इन्द्रधनुष को आसमाँ में
रोकने की जिद है....
बदलते मौसमों की
मनमानी बहुत हुई
अब इन मौसमों के मिजाज से
निपटने की जिद है
आस में पास में राख में खाक में
रेंगती हुई जिन्दगी
पँख लगा कर आज
उड़ाने की जिद है
पल पल लम्हा लम्हा
सिमटती हुई जिन्दगी
ओर छोर पकड़ कर
फैलाने की जिद है
बीमार घुटन सी
दम तोड़ती यह बंदिशे
इन बेडियों को झटक कर
खड़े होने की जिद है
उन्मुक्त गगन से
आँख मिला कर
खुली हवा में
साँस लेने की जिद है...
Monday, November 19, 2007
अग्नि
थोड़ी रोशनी
थोड़ी उष्णता
कुछ उड़ते हुए
जुगनु
नीचे व्यय होती
जलती ...भस्म होती
लकड़ी
जुगनु बस
उतरने को है
खाक में लुप्त
होने को है
लगता है
लकड़ी राख होने को है
आग बस
बुझने को है
थोड़ी उष्णता
कुछ उड़ते हुए
जुगनु
नीचे व्यय होती
जलती ...भस्म होती
लकड़ी
जुगनु बस
उतरने को है
खाक में लुप्त
होने को है
लगता है
लकड़ी राख होने को है
आग बस
बुझने को है
Sunday, November 18, 2007
शर्त
मैने आवाज़ नहीं दी थी
तुमने ना जाने क्या सुना...
मूक अहसासों को कभी
गति नहीं दी....
तुम्ही ने पास आकर
सुना होगा....
मन का अनुवाद
शब्दों में चाहते हो...
जिद तो अच्छी है...लेकिन
चिरपरिचित भाषा में
मन का संवाद कैसे होगा....?!
सागर को नमक और पानी
में बाँटने की चाहत
तो समझ भी लूँ
पर गहराईयों में जो हलचल है
उसका भाग कैसे होगा....?!
रंगो को सुनना चाहो
आवाज़ को चखना...
तो फिर...
मन को ही
उन्मुक्त करना होगा...
तुमने ना जाने क्या सुना...
मूक अहसासों को कभी
गति नहीं दी....
तुम्ही ने पास आकर
सुना होगा....
मन का अनुवाद
शब्दों में चाहते हो...
जिद तो अच्छी है...लेकिन
चिरपरिचित भाषा में
मन का संवाद कैसे होगा....?!
सागर को नमक और पानी
में बाँटने की चाहत
तो समझ भी लूँ
पर गहराईयों में जो हलचल है
उसका भाग कैसे होगा....?!
रंगो को सुनना चाहो
आवाज़ को चखना...
तो फिर...
मन को ही
उन्मुक्त करना होगा...
Friday, November 16, 2007
झिझक
जब से याद आता है
मैं बस यहीं रही हूँ
दाना यहीं मिल जाता है
मैं यहीं चुग लेती हूँ
फुदक कर
कभी यहाँ
कभी वहाँ
कभी दूर नहीं गई
धूप का मेरा टुकड़ा
मेरे पास आ जाता है
छाँव की मेरी चादर
रोज़ ओढ़
सो जाती हूँ
कभी पोखर में
निहारती हूँ
तो पँख मुझे
दिख जाते हैं...
फुदकते फुदकते
अधखुले से खुल
जाते हैं
पँख फैला कर
उड़ान कब भरी है?!!
छलांगों में ही
गन्तव्य मुझे
मिल जाता है
आज पोखर में
अंबर देखा जब
जकड़े हुए इन पँखों ने
उड़ने का सपना
देखा है
नभ पर
एक मंजिल दिखती है
बादल से
गुज़र कर जाती है
क्षितिज तक का
रस्ता तो दिखता है
फिर रस्ता
कुछ धुँधला सा है
पँख गर मेरे पास हैं तो
मंजिल उड़ान ही होगी ना?
फिर उड़ने से
क्यों हिचकता है?
गिरने से
डर क्यूँ लगता है?!
छोटी छोटी छलांगों से
क्यूँ तृप्त हो जाता है?!
फुदकने को उड़ान
समझता है...
छाँव को आकाश
पुकारता है...
मैं बस यहीं रही हूँ
दाना यहीं मिल जाता है
मैं यहीं चुग लेती हूँ
फुदक कर
कभी यहाँ
कभी वहाँ
कभी दूर नहीं गई
धूप का मेरा टुकड़ा
मेरे पास आ जाता है
छाँव की मेरी चादर
रोज़ ओढ़
सो जाती हूँ
कभी पोखर में
निहारती हूँ
तो पँख मुझे
दिख जाते हैं...
फुदकते फुदकते
अधखुले से खुल
जाते हैं
पँख फैला कर
उड़ान कब भरी है?!!
छलांगों में ही
गन्तव्य मुझे
मिल जाता है
आज पोखर में
अंबर देखा जब
जकड़े हुए इन पँखों ने
उड़ने का सपना
देखा है
नभ पर
एक मंजिल दिखती है
बादल से
गुज़र कर जाती है
क्षितिज तक का
रस्ता तो दिखता है
फिर रस्ता
कुछ धुँधला सा है
पँख गर मेरे पास हैं तो
मंजिल उड़ान ही होगी ना?
फिर उड़ने से
क्यों हिचकता है?
गिरने से
डर क्यूँ लगता है?!
छोटी छोटी छलांगों से
क्यूँ तृप्त हो जाता है?!
फुदकने को उड़ान
समझता है...
छाँव को आकाश
पुकारता है...
Tuesday, November 13, 2007
अस्तित्व
तरंगों का एक
चुंभकीय आकर्षण…
बस
इतना ही है
मेरा अस्तित्व
दिशा कोई भी तरंग
बदल सकती है
उद्विग्न कर सकती है
उल्लासित कर सकती है
मैं अपने अस्तित्व में
इसके बढ़ते घटते
रूप को
बाँध कर
रखना चाहती हूँ
पर ठोस नहीं हूँ
तरल नहीं हूँ
वायु नहीं हूँ
बस अवस्था हूँ
जो तापमान के बदलने से
बदल जाती है
कुंजी मेरे हाथ नहीं है
कुंजी पटल पर ना जाने कौन
थपथपाता है
और मैं अपने
अस्तित्व में
इन तरंगों को
घटा जोड़ कर
दिशा तय करती हूँ
दिशा.....जो उद्यत है
आश्रित है
फिर से
कुंजी आघात पर....
......वो कुंजी
जो मेरे पास में नहीं है
हाथ में नहीं है
बदल रही हूँ
यही नियति है
अपनी ऊर्जा में
कभी क्षीण
कभी प्रबल
चाहती हूँ....
इस कदर
तरंग से तरंग जोड़ दूँ...
कि हो जाऊँ
स्थिर....
नहीं तो...
ब्रम्हाण्ड में...
फैल जाऊँ
बिखर....
चुंभकीय आकर्षण…
बस
इतना ही है
मेरा अस्तित्व
दिशा कोई भी तरंग
बदल सकती है
उद्विग्न कर सकती है
उल्लासित कर सकती है
मैं अपने अस्तित्व में
इसके बढ़ते घटते
रूप को
बाँध कर
रखना चाहती हूँ
पर ठोस नहीं हूँ
तरल नहीं हूँ
वायु नहीं हूँ
बस अवस्था हूँ
जो तापमान के बदलने से
बदल जाती है
कुंजी मेरे हाथ नहीं है
कुंजी पटल पर ना जाने कौन
थपथपाता है
और मैं अपने
अस्तित्व में
इन तरंगों को
घटा जोड़ कर
दिशा तय करती हूँ
दिशा.....जो उद्यत है
आश्रित है
फिर से
कुंजी आघात पर....
......वो कुंजी
जो मेरे पास में नहीं है
हाथ में नहीं है
बदल रही हूँ
यही नियति है
अपनी ऊर्जा में
कभी क्षीण
कभी प्रबल
चाहती हूँ....
इस कदर
तरंग से तरंग जोड़ दूँ...
कि हो जाऊँ
स्थिर....
नहीं तो...
ब्रम्हाण्ड में...
फैल जाऊँ
बिखर....
Monday, November 12, 2007
सिले अहसास
सर्द रातों में
ठंडे अहसासों को
रूह की आग में
सेंकना चाहती है....
हथेली खोल कर
आग में,
मुट्टी में रखे
स्पर्श में,
ऊष्ण घोलना चाहती है....
फिर
अपने ही हाथ से
हाथ को
थाम कर
ना जाने क्या
सँभालना चाहती है..
सुन्न हो जायें
इससे पहले
उनमें
स्नेह का संचार
करना चाहती है
आज शायद
फिर किसी
स्पर्श की
उम्मीद
करना चाहती है....
ठंडे अहसासों को
रूह की आग में
सेंकना चाहती है....
हथेली खोल कर
आग में,
मुट्टी में रखे
स्पर्श में,
ऊष्ण घोलना चाहती है....
फिर
अपने ही हाथ से
हाथ को
थाम कर
ना जाने क्या
सँभालना चाहती है..
सुन्न हो जायें
इससे पहले
उनमें
स्नेह का संचार
करना चाहती है
आज शायद
फिर किसी
स्पर्श की
उम्मीद
करना चाहती है....
Sunday, November 11, 2007
आज शाम
नमकीन सी हवा
के साथ
करारी सी कोई
बात हो जाये
समंदर के
किनारे पर
हाथ में हाथ
हो जाये
गुलाबी शाम के
आगोश में
बैठे बैठे
रात हो जाये
हंसीं कोई
ख्वाईश की
टूटे तारे से
मुलाकात हो जाये
के साथ
करारी सी कोई
बात हो जाये
समंदर के
किनारे पर
हाथ में हाथ
हो जाये
गुलाबी शाम के
आगोश में
बैठे बैठे
रात हो जाये
हंसीं कोई
ख्वाईश की
टूटे तारे से
मुलाकात हो जाये
Saturday, November 10, 2007
मोड़
मुड़ते हुए रास्ते
रुकते क्यूँ नहीं?!
ढ़लते हैं कभी…
और चढ़ते हैं कभी…
मेरी एक शाम
गिरी थी यहाँ
वहीं रुक गई
उग गई
पनप गई
आज देखा तो
फूलों से लदी थी ड़ालियाँ
कहाँ रुक सकी...!!
मुड़ते हुए रास्ते
ठहरते जो नहीं......!
रुकते क्यूँ नहीं?!
ढ़लते हैं कभी…
और चढ़ते हैं कभी…
मेरी एक शाम
गिरी थी यहाँ
वहीं रुक गई
उग गई
पनप गई
आज देखा तो
फूलों से लदी थी ड़ालियाँ
कहाँ रुक सकी...!!
मुड़ते हुए रास्ते
ठहरते जो नहीं......!
Thursday, November 08, 2007
दीपावली
उजालों की चाह में
उड़ कर
सूर्य से
मन का
दिया जला लूँ ज़रा
अमावास के
अँधेरों के लिये
रौशन उजाले
सँभाल लूँ ज़रा
कोई छू ले तो
लौ से उजाले
उसमें भी
कर दूँ मैं ज़रा
रात ऐसी है यह
चाँद के उजाले भी नहीं
दिये से दिये जलाकर
अँधेरों को बुझा दे ज़रा
उड़ कर
सूर्य से
मन का
दिया जला लूँ ज़रा
अमावास के
अँधेरों के लिये
रौशन उजाले
सँभाल लूँ ज़रा
कोई छू ले तो
लौ से उजाले
उसमें भी
कर दूँ मैं ज़रा
रात ऐसी है यह
चाँद के उजाले भी नहीं
दिये से दिये जलाकर
अँधेरों को बुझा दे ज़रा
Monday, November 05, 2007
नियति
सूखे पत्ते बरामदे में
खुसरफुसर कर रहे हैं
दो कदम आगे
एक कदम पीछे...
फिर हवा के साथ
छोटी सी एक उड़ान...
उबासी लेती दोपहरी
बेसरोकार सी
सुस्ता रही है...
मन ही मन
मुस्करा रही है....
थोड़ी देर बाद....
ये पत्ते
जरूर थक कर सो जायेंगे
नि:शब्द हो जायेंगे
खुसरफुसर कर रहे हैं
दो कदम आगे
एक कदम पीछे...
फिर हवा के साथ
छोटी सी एक उड़ान...
उबासी लेती दोपहरी
बेसरोकार सी
सुस्ता रही है...
मन ही मन
मुस्करा रही है....
थोड़ी देर बाद....
ये पत्ते
जरूर थक कर सो जायेंगे
नि:शब्द हो जायेंगे
Sunday, November 04, 2007
संभावना

आज आसमान में
बादल बिखरे से पड़े थे
जैसे कपास की
फसल पकी हो
पापकॉर्न का पैकट
हाथ से छूटा हो
जैसे भेड़ की भीड़
तितर बितर हुई हो
कई खत लिख लिख कर
कोई गोल कर उछालता गया हो
सोचा समेट लूँ...
चढ़ने लगी...
आसमान के लिये...
छत पर ही आकर
रुक गई....
शायद यह बादल ही बरस जायें...
बादल बिखरे से पड़े थे
जैसे कपास की
फसल पकी हो
पापकॉर्न का पैकट
हाथ से छूटा हो
जैसे भेड़ की भीड़
तितर बितर हुई हो
कई खत लिख लिख कर
कोई गोल कर उछालता गया हो
सोचा समेट लूँ...
चढ़ने लगी...
आसमान के लिये...
छत पर ही आकर
रुक गई....
शायद यह बादल ही बरस जायें...
Friday, November 02, 2007
रूपांतरण
कल्पना के पृष्ठ पर
आड़ी तिरछी रेखायें खींची
एक सपने का खाका
एक अधूरा सा आकार
रंग भरने अभी थे
रूप देना था बाकी
एक हलचल हुई
रेखायें जगी...
जिन हाथों से खिंची
उस हथेली पर रुकी
जिंदगी की सगी
जिंदा होकर बसी...
किस्मत के रास्ते
आड़ी तिरछी रेखायें खींची
एक सपने का खाका
एक अधूरा सा आकार
रंग भरने अभी थे
रूप देना था बाकी
एक हलचल हुई
रेखायें जगी...
जिन हाथों से खिंची
उस हथेली पर रुकी
जिंदगी की सगी
जिंदा होकर बसी...
किस्मत के रास्ते
कल्पना से उतरे
आज ये रेखायें
मेरी मुट्टी में पले
आज ये रेखायें
मेरी मुट्टी में पले
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