Wednesday, December 26, 2007

आधा-अधूरा

कुछ बातें
बनाने की कोशिश थी
पकने से पहले ही
उतार दी

स्वाद तो कुछ कुछ
वैसा ही है...
पर उतनी करारी नहीं....

मिलना ही था....
मिल तो लिये
फिर भी कुछ बेकरारी रही....

Monday, December 24, 2007

उम्मीद

हैरां हूँ!!
तू मुझसे अब भी
नाउम्मीद नहीं है

सूली पर हर साल
चड़ा आते हैं हम...

और तू ममता के हाथ में
मासूम स्मित में
फिर सँभल जाता है....

Friday, December 21, 2007

त्रिपदम


दुबई में 14 दिसंबर को पूर्णिमा वर्मन जी मुझसे , अर्बुदा ,मीनाक्षीजी, स्वाती, विध्याधरजी से मिली। उन्होने हाईकू के बारे में बताया और लिखने को प्रेरित किया।


नियमों में बँध कर लिखना हमेशा मुश्किल लगा है पर कोशिश का वादा किया था...सो की है....


आपकी समीक्षा का इंतज़ार है...


हाँ त्रिपदम शब्द मीनाक्षीजी के ही मन में आया था और हम सबको भा गया...



इच्छा अपू्र्व
दरिया पर चलूँ
डूबी हमेशा



बर्फ पिघली
पर्वत के ऊपर
धरा डुबोयी




रूह सतह
स्नेह स्पर्श पाकर
आँसू हो गई



परिवर्तन
बदलता मौसम
जिंदा बचेंगे ?




नेह स्पंदन
मासूम बचपन
नंगा अकेला




तुम्हारा साथ
गर्म चाय की चुस्की
सुंदर शाम




नींद में तुम
करवटों के साथ
बुलाते मुझे



रेगिस्थान से
मिठास बटोरता
डेट पॉम ट्री




गाय का थन
मटकी भरा दूध
प्यासा बछड़ा



उजालों भरा
जगमग शहर
अँधेरा मन



शब्दों से लिख
आवाज़ से छूकर
मुझसे मिल



ठंडी भोर है
ठिठुरता मौसम
तुम कहां हो ?



खिड़की खुली
चिमनी में से धुआँ
वो घर में है




रस्सी कूदते
ठहरे पलचिन्ह
नोस्टालजिया



ढक्कन रख
भावनायें सँभाली
भाप सी उड़ी



आड़े तिरछे
बनते बिगड़ते
ख्वाब के खाके




गर्म हवायें
सपाट रेगिस्थान
तरसी प्यास



आँसू से स्वाद
मैने चख के देखा
नमकीन हो !!



शाम उतारी
आगोश मे तुम्हारे
ताजा हो गई



कितनी बार
पलट कर देखे
ढ़लती शाम


Sunday, December 16, 2007

रेला

हवा से
बाँधे हैं
साँसों के झूले

जो तेरी
धड़कनों..
की तरंगो ने
छुआ...

भरने लगी
आसमाँ में
हिचकोले..

Saturday, December 15, 2007

मैं और तू

मैं

समंदर बवंडर
मैं हलचल चंचल

गहरे में उतरती
उथले में उभरती

लहरों में सँभलती
साहिल पर छलकती

बहकती चहकती
सिमटती बिखरती

चाँद की चाह में
ललक से उछलती

सीपी सी शर्माई
मोती सी भर्राई

तूफान हूँ
मन का ऊफान हूँ

बोतल में राज़
की राजदार हूँ


डुबोया भी है
और उभारा भी है

मैं बेचैन हूँ
स्वप्निल नैन हूँ





तू

वो आगोश है
जिसके होश में
सँभलती भी हूँ
संवरती भी हूँ

जहाँ सिमट कर
आराम से
नींद की छाँव में
ठहरती हूँ मैं






मैं समंदर हूँ
तरंगों भरा....
तू वो तल है
जो इसको लेकर खड़ा....

Tuesday, December 11, 2007

आम अस्तित्व

भीड़ में बहुत आवाज़ें
और मैं वहीं बैठ जाना चाहती हूँ
हो सके तो अपनी आवाज़
बीचोबीच दफन करना चाहती हूँ
अनसुना करना जब मुमकिन ना रहा
तभी शोर की तलाश शुरु की
अँधेरों में दिया जलाना ना पड़े
सो भोर की तलाश शुरु की


किस्मत और समय से जूझना
थोड़ी मेहनत का काम है
चंद पंक्तियों को लिखकर ही
मुझको आराम है
मै चुप होती नहीं अक्सर...
कि कहीं सुनना ना पड़े....
सुनी अपनी आवाज़ को
समझना ना पड़े


बहुत पुरानी पड़ी एक डायरी में
फीके पड़ते ध्येय के टुकड़े
जोड़कर दिशा तय करना ही क्यूँ
किसी भी नई राह पर चलना ही क्यूँ
जानी पहचानी मंजिले सजी बाज़ारों में
नये ऑफरों के साथ खड़ी कतारों में
किसी नये के निर्माण का
जोखिम उठाना ही क्यूँ
अपने अस्तित्व का प्रमाण
जुटाना ही क्यूँ


साधारण से जीवन की
जटिलताओं के बीच
असाधारण लक्ष्यों के
दिवास्वप्न देखती हूँ मैं....
कुछ शौक कुछ आदत से
मजबूर हूँ
कि खुद को
असाधारण स्वरूप में
देखती हूँ मैं


दिन, हर रात
सो कर उठ जाता है
डायरी थोड़ी और धूल
समेट लाती है
मैं रोज़ आवाज़ दफन कर आती हूँ
जिन्दगी से नज़र बचा कर निकल जाती हूँ

Monday, December 10, 2007

आते आते

हर बात
मुझ तक आते आते
कुछ बदल सी जाती है
कभी हवा से
थोड़ी खुशबू
कभी नमी ले आती है

हर आवाज़
की आवृत्ति
कुछ अलग हो जाती है
कभी वो
फुसफुसाहट
कभी गूँज
बन जाती है

संदर्भ भूल कर
बातें अपना
सही अर्थ
खो आती हैं
शब्दकोष के शब्दों जैसे
पंक्ति में खो जाती हैं

दृष्टि का ही
दोष ये होगा
दृष्य बदल सा जाता है
आँसू के चश्मे से देखो
सब कुछ
धुँधला सा जाता है

आशा प्रत्याशा के
बीच में खिंच कर
आकार कहीं खो आती है
आते आते बात हमेशा
अपेक्षाओं मे ढ़ल जाती है

Saturday, December 08, 2007

आत्मसंरक्षण

चाहती तो नहीं थी
पर सफाई कब वैकल्पिक थी
कोनों के जालों तक पहुँची
और उलझती गई


कोने साफ हुए
फिर भी...
कुछ जाले मेरे हाथ लग गये

और साथ ही
रेंगते हुए
पकड़े गये कई अहसास
जो इन जालों में आकर
दम तोड़ चुके थे

दस्तानों के बिना
क्या बचाव
मुमकिन है ?!

Friday, December 07, 2007

मिथ्याबोध

कमरे में उजाला
टिमटिमा रहा था
मोमबत्ति की लौ
हठ कर के
हवा में
डगमगाते हुए
चल रही थी

अजीब सी
गलतफ़हमी थी

अपनी आग समझ
लगातार व्यय होती
मोमबत्ति को
शायद मालूम नहीं था
उसे जलाया किसने है.....

Wednesday, December 05, 2007

धूप


आँगन में गिरी
एक एक किरण
उठाती गई
सोचा शायद
धूप ही पिरो लूँगी

समय की सूई की
आँख में से
एक लम्हा
निकाल आई

किरणों की कतार
ताज़ा उन्माद लिये
झिलमिलाती धूप
सी ही लग रही थी

पर कब तक.....

साँझ तक तो
मुरझा ही जायेगी.....

Monday, December 03, 2007

सीमांकन

मेरे साथ चलते हुए
तुम कदम भी नाप रहे हो...
हर लम्हे का वजन
कोशिश कर माप रहे हो...

तुम्हे लगता है
हर रंग का नाम होगा
बदलते रंगमंच का
कोई प्रयोजन आम होगा

सोच से तुम भाव को
कैसे कोई विस्तार दोगे ?!
अनुभूति को छुए बिना
अभिव्यक्ति को क्या शब्द दोगे....?!

नाम की तख्ती
के ढ़ेर से एक नाम दोगे……!!
अस्तित्व के निर्माण को
फिर किस तरह नये आयाम दोगे ??

Sunday, December 02, 2007

जिंदगी

गुनगुने से घर में
रसोई में पकती है जिंदगी
सुबह भोर की रोशनी के साथ
चुस्कियों में मिलती है जिंदगी

बिस्तर में अंगडाईयाँ उतार
उबासियों को उठाती है जिन्दगी
दूध की मूँछ पहन
मुस्कुराती है जिंदगी

नये अजीब तरानों पर
तिरकती है जिंदगी
नहा धोकर नयी सी
हो जाती है जिंदगी

बुट्टे में नींबू नमक मिर्च सी
लगती है जिंदगी
फरमाईशों पर बार बार
गुनगुना देती है जिंदगी

हाथ थाम लेने पर
पकड़ मे आ जाती है जिंदगी
मुट्टी में ही
सँभल जाती है जिंदगी