भीड़ में बहुत आवाज़ें
और मैं वहीं बैठ जाना चाहती हूँ
हो सके तो अपनी आवाज़
बीचोबीच दफन करना चाहती हूँ
अनसुना करना जब मुमकिन ना रहा
तभी शोर की तलाश शुरु की
अँधेरों में दिया जलाना ना पड़े
सो भोर की तलाश शुरु की
किस्मत और समय से जूझना
थोड़ी मेहनत का काम है
चंद पंक्तियों को लिखकर ही
मुझको आराम है
मै चुप होती नहीं अक्सर...
कि कहीं सुनना ना पड़े....
सुनी अपनी आवाज़ को
समझना ना पड़े
बहुत पुरानी पड़ी एक डायरी में
फीके पड़ते ध्येय के टुकड़े
जोड़कर दिशा तय करना ही क्यूँ
किसी भी नई राह पर चलना ही क्यूँ
जानी पहचानी मंजिले सजी बाज़ारों में
नये ऑफरों के साथ खड़ी कतारों में
किसी नये के निर्माण का
जोखिम उठाना ही क्यूँ
अपने अस्तित्व का प्रमाण
जुटाना ही क्यूँ
साधारण से जीवन की
जटिलताओं के बीच
असाधारण लक्ष्यों के
दिवास्वप्न देखती हूँ मैं....
कुछ शौक कुछ आदत से
मजबूर हूँ
कि खुद को
असाधारण स्वरूप में
देखती हूँ मैं
दिन, हर रात
सो कर उठ जाता है
डायरी थोड़ी और धूल
समेट लाती है
मैं रोज़ आवाज़ दफन कर आती हूँ
जिन्दगी से नज़र बचा कर निकल जाती हूँ