Sunday, February 24, 2008

पुष्पित

लम्हों को
नियम से बँध
कुछ इस तरह
खुलना होगा

पँखुडियों की
अदा सा
रंग में डूब कर
खिलना होगा

अधखुली
बात को
धीरे से
महकना होगा

जीवन के
केन्द्र के
आसपास
जुटना होगा

आलोक को
आलिंगन में
बाँधने के लिये
उठना होगा

नमी की
दो बूँद
सँभालने के लिये
रुकना होगा

बिखरने से पहले
हौले से
लम्हों को ....लम्हों का हाथ
पकड़ना होगा

जिन्दगी
तुझको तो
सुमन सा ही
संवरना होगा......

8 comments:

अनुराग अन्वेषी said...

हां बेजी,
"तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर, अगर है कहीं स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर।"
बहुत दिनों बाद ये पंक्तियां फिर मेरे ज़ेहन में शोर मचाने लगीं आपकी कविता पढ़कर।
गजब का आशावाद।
प्यारी कविता है।

Sanjay Gulati Musafir said...

इस से पहले मैं कुछ सोच पाता मेरे अन्दर से जो शब्द निकले, वे थे "बहुत सुन्दर रचना"

बहुत सोच तो शब्द निकले "बहुत सुन्दर रचना"

mehek said...

बिखरने से पहले
हौले से
लम्हों को ....लम्हों का हाथ
पकड़ना होगा
beautiful words,zindagi suman si hi khilni chahiye.kavita ati sundar hai.

बाल किशन said...

"जिन्दगी
तुझको तो
सुमन सा ही
संवरना होगा......"
वाह! वाह!
सुन्दर! अति सुंदर!

नीरज गोस्वामी said...

बहुत ही कोमल एहसासों को जगाने सहलाने वाली रचना..भाव और शब्द दोनों की लाजवाब. वाह वा...
नीरज

रजनी भार्गव said...

बहुत अच्छी है बेजी।

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

शब्दों का जादूगर कहूँ तो चलेगा क्या? बहुत अच्छी कविता थी।

जोशिम said...

बहुत बढ़िया बेजी - [ वैसे तुम्हारी एअरपोर्ट की सड़क पर क्यारियां बहुत सुंदर हो रही हैं आजकल ]