लम्हों को
नियम से बँध
कुछ इस तरह
खुलना होगा
पँखुडियों की
अदा सा
रंग में डूब कर
खिलना होगा
अधखुली
बात को
धीरे से
महकना होगा
जीवन के
केन्द्र के
आसपास
जुटना होगा
आलोक को
आलिंगन में
बाँधने के लिये
उठना होगा
नमी की
दो बूँद
सँभालने के लिये
रुकना होगा
बिखरने से पहले
हौले से
लम्हों को ....लम्हों का हाथ
पकड़ना होगा
जिन्दगी
तुझको तो
सुमन सा ही
संवरना होगा......
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8 comments:
हां बेजी,
"तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर, अगर है कहीं स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर।"
बहुत दिनों बाद ये पंक्तियां फिर मेरे ज़ेहन में शोर मचाने लगीं आपकी कविता पढ़कर।
गजब का आशावाद।
प्यारी कविता है।
इस से पहले मैं कुछ सोच पाता मेरे अन्दर से जो शब्द निकले, वे थे "बहुत सुन्दर रचना"
बहुत सोच तो शब्द निकले "बहुत सुन्दर रचना"
बिखरने से पहले
हौले से
लम्हों को ....लम्हों का हाथ
पकड़ना होगा
beautiful words,zindagi suman si hi khilni chahiye.kavita ati sundar hai.
"जिन्दगी
तुझको तो
सुमन सा ही
संवरना होगा......"
वाह! वाह!
सुन्दर! अति सुंदर!
बहुत ही कोमल एहसासों को जगाने सहलाने वाली रचना..भाव और शब्द दोनों की लाजवाब. वाह वा...
नीरज
बहुत अच्छी है बेजी।
शब्दों का जादूगर कहूँ तो चलेगा क्या? बहुत अच्छी कविता थी।
बहुत बढ़िया बेजी - [ वैसे तुम्हारी एअरपोर्ट की सड़क पर क्यारियां बहुत सुंदर हो रही हैं आजकल ]
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