
जीवन का बिंदुरेख
कुछ ही बिंदुओं पर
निरंतर लौट जाता है.....
निदोल की गति सा
केन्द्र पर हर बार
लौट के गुजर जाता है....
हर पल....कालद दर से
अग्रसर...
उसी बिंदु की तरफ...
रुकता नहीं...
ठहरता नहीं...
पर पहुँचना चाहता है
अगर रोक दूँ
यह गति
वहीं...
ठीक केन्द्र पर
कालद स्पंद में
एक अंतरायन....
शायद...
समय रुक जाये
मिट जाये
युगांतर से चली
यह तृष्णा
परितृप्त...
नहीं तो
फिर
टिक टिक
कालद आवृत्ति...
वही बिंदु निरंतर.....
ना ओज का संचार
ना पतन...
......और फिर खत्म
एक जीवनकाल.....




4 comments:
beji jee,
saadar abhivaadan. sundar shabdon ke saamanjasya se ek sundar rachnaa kaise nikaltee hai aap se seekhaa jaa saktaa hai. aapko padhna achha laga . likhtee rahein.
वक़्त और जीवन को आपस में बुन दो तो वह सफ़र है ज़िन्दगी... कमाल की कविता!
बहुत सुन्दर भाव.
तभी तो चाभी भरे रहना बहुत ज़रूरी है [ है कि नहीं ?]
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