तलाश ज़ारी है...
मन के मंजिल की...
क्या पता कहाँ है...
हर रोज़ कुछ बदली सी दिखती है....
रोज़ कुछ कदम मैं इसकी तरफ...
रोज़ यह थोड़ा और सरक जाती है....
आसमान से उस दिन बादलों को देखा था...
अलग अलग रूप में ढ़लने की बड़ी जल्दी थी उन्हे....
लगातार एक सिरा अंदर चला जाता...
और दूसरी तरफ से बाहर.....
कुछ गुणा जोड नहीं...
पर रूप बदलता रहता.....
मैं सोचती हूँ नीर के इन कणों के बारे में....
नूर सा उठ बादल भी बन गये...
इतना ऊपर.....
.....पर नीचे....
समंदर में ...
पहाड़ों में ...
घाटियों में ...
रेत पर....
अपने सायों को लगातार घसीटते हुए.....
शायद इस खिंचाव से
थक हार कर ही ...
बरस जाते हैं यह....
तप के कितना भी ऊपर उठें....
फिर तरल बन जाते हैं.....
रूप बदल जाते हैं....
जगह भी.....
सायों को अपने अंदर ...
नहीं तो बाहर...
पर साथ में लेकर चलते हैं....
सायें छिपा भी लें...
मिटते नहीं है...
कहीं अंदर बसे रहते हैं...
थोड़ी रौशनी की फिराक में...
फिर बाहर....
शायद मैं इन्ही सायों से दूर
जाना चाहती हूँ....
मंजिल के आभास के बिना....
मंजिल की ओर नहीं...
बस सायों से दूरी बनाना चाहती हूँ....
पर मैं....
जितना रूप में हूँ
उससे ज्यादा सायों में हूँ....
शिखर पर पहुँच कर भी....
नीचे ज़मीं का जायका
बना रहता है....
हर शिखर की तस्वीर की
एक नेगाटिव
सायों में सिमट जाती है.....
सच सायों में...
या शायद सायों में सच
कैद हो जाता है....
कहीं भी जाऊँ...
इसीलिये लौट वहीं फिर आती हूँ...
हर तलाश को....
रौशनी में...
सायों से बिछुड़....
गुमा आती हूँ.....
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7 comments:
सुपर इम्पोज़्ड इमेज़ेस ?
लगातार बादलों और जमीन के बीच हिंडोले पर झुलाती कविता। अच्छी लगी। वैसे मन के बारे में गीता में कहा गया है - मन एव मनुष्यानाम् कारण बंधन मोक्षयो...
बस, मन की बातें हैं..सुन्दर कविता.
beji,
kamaal hai aap to aansuoon ke andar bhee sama gayee hain. achha lagaa. hamesha kee tarah.
ओफ़्फ़, साये में धूप है कि धूप में साया है? मैं कहां आया है? मैं फीलिंग प्रिटी लोस्ट, यू नो?..
बहुत बढिया मन की उडान है।सुन्दर रचना है।
तलाश ज़ारी है...
मन के मंजिल की...
क्या पता कहाँ है...
हर रोज़ कुछ बदली सी दिखती है....
रोज़ कुछ कदम मैं इसकी तरफ...
रोज़ यह थोड़ा और सरक जाती है....
बहुत सुन्दर!
घुघूती बासूती
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