मुझे
तुम्हारी आँखों में झाँकना
अच्छा लगता है
अपनी छवि को
समस्त सँभावनाओं
के साथ देखना
कितना सहज है यहाँ
तुम्हारी आँखों में
मेरे हर रूप की स्वीकृति है
कभी कोई तुम्हे
एकदम से भा जाती है
और तुम झट पलक बंद कर
उसे याद के बक्से में
छिपा देते हो
कई बार
कोई पहचान के रंग
भूल जाती हूँ
तब
तुम्हारी आँखों में
इन्हे टटोल
आती हूँ
.......
हर बार जब भी
देखते हो मुझे
किनारे
कभी काटते नहीं
कोई खाँचा नहीं
जिसमें
ढ़ालते हो मुझे
बदलती रौशनी में
बदलती परछाई के साथ
देखते हो मुझे
.....
मेरे शब्द
और उनके अर्थ
मेरी आवाज़
अंदाज़
और अदा
मुझे सुनते हो तुम...
देखते हो तुम...
जानते हो तुम
मुझे
तुम्हारी आँखों में झाँकना
अच्छा लगता है
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8 comments:
मुझे भी लगता है. अच्छा. मगर कभी-कभी नहीं भी लगता. पता नहीं ये 'उनको' अच्छा लगता है या नहीं! इतनी उलझनों से परे सीधे-सीधे अच्छा (या बुरा) लगता रहे, ऐसा क्यों नहीं हो जाता?
its so touching.....
payar hai yeh..aur meetha sa ek ehsaas
क्या बात है, मै चूक गई ....
सहज भावना की सुंदर अभिव्यक्ति
sahaj,sundar bhavana,bahut khubsurat.
सुन्दर अर्थपूर्ण रचना बेजी
बेजी - बहुत सरलता से बहुत चमत्कार लिखा है - मनीष
यह कविता किसी भी रिश्ते के लिये बिल्कुल सटीक जाती है!
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