Tuesday, February 19, 2008

प्रतिबिंब

मुझे
तुम्हारी आँखों में झाँकना
अच्छा लगता है
अपनी छवि को
समस्त सँभावनाओं
के साथ देखना
कितना सहज है यहाँ
तुम्हारी आँखों में
मेरे हर रूप की स्वीकृति है


कभी कोई तुम्हे
एकदम से भा जाती है
और तुम झट पलक बंद कर
उसे याद के बक्से में
छिपा देते हो
कई बार
कोई पहचान के रंग
भूल जाती हूँ
तब
तुम्हारी आँखों में
इन्हे टटोल
आती हूँ

.......
हर बार जब भी
देखते हो मुझे
किनारे
कभी काटते नहीं
कोई खाँचा नहीं
जिसमें
ढ़ालते हो मुझे
बदलती रौशनी में
बदलती परछाई के साथ
देखते हो मुझे


.....



मेरे शब्द
और उनके अर्थ
मेरी आवाज़
अंदाज़
और अदा
मुझे सुनते हो तुम...
देखते हो तुम...
जानते हो तुम

मुझे
तुम्हारी आँखों में झाँकना
अच्छा लगता है

8 comments:

Pramod Singh said...

मुझे भी लगता है. अच्‍छा. मगर कभी-कभी नहीं भी लगता. पता नहीं ये 'उनको' अच्‍छा लगता है या नहीं! इतनी उलझनों से परे सीधे-सीधे अच्‍छा (या बुरा) लगता रहे, ऐसा क्‍यों नहीं हो जाता?

Keerti Vaidya said...

its so touching.....

payar hai yeh..aur meetha sa ek ehsaas

आभा said...

क्या बात है, मै चूक गई ....

कंचन सिंह चौहान said...

सहज भावना की सुंदर अभिव्यक्ति

mehek said...

sahaj,sundar bhavana,bahut khubsurat.

Sanjay Gulati Musafir said...

सुन्दर अर्थपूर्ण रचना बेजी

जोशिम said...

बेजी - बहुत सरलता से बहुत चमत्कार लिखा है - मनीष

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

यह कविता किसी भी रिश्ते के लिये बिल्कुल सटीक जाती है!