एक सामान्य से
दिन के पोखर पर
रुका एक पल था वह.....
ना जाने कब....
तैरते हुए...
उन सपनों की सतह पर
एक कतरा सा थम गया....
रौशनी से खेलते खेलते
लुढ़कते सरकते.......
ना जाने....क्या हुआ....
उड़ गया?!
या….
डूब गया…………
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6 comments:
अगर गर्म मिजाज़ होगा तो उड़ गया होगा - नहीं तो यहीं कहीं बच्चों के साथ खेल रहा है अभी मिल जाएगा [ :-)] बस चुटकी नहीं बजानी है - rgds - manish
मनछू अभिव्यक्ति। यात्रा के दौरान आप की कविताओं के सानिध्य से वंचित आप की रचनाएं वाकई कविता होती हैं।
beji,
saadar abhivaadan. bilkul saraltaa se seeddhe lafzon mein kaafee kuchh kehnaa aapkee khaasiyat hai. achha lagaa.
waah...ye baat mehsuusi jaa sakti hai bas....
bahut sundar
बेहतरीन, बेजी.
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