Sunday, March 02, 2008

बूंद

एक सामान्य से
दिन के पोखर पर
रुका एक पल था वह.....
ना जाने कब....
तैरते हुए...
उन सपनों की सतह पर
एक कतरा सा थम गया....

रौशनी से खेलते खेलते
लुढ़कते सरकते.......
ना जाने....क्या हुआ....

उड़ गया?!
या….
डूब गया…………

6 comments:

जोशिम said...

अगर गर्म मिजाज़ होगा तो उड़ गया होगा - नहीं तो यहीं कहीं बच्चों के साथ खेल रहा है अभी मिल जाएगा [ :-)] बस चुटकी नहीं बजानी है - rgds - manish

दिनेशराय द्विवेदी said...

मनछू अभिव्यक्ति। यात्रा के दौरान आप की कविताओं के सानिध्य से वंचित आप की रचनाएं वाकई कविता होती हैं।

ajay kumar jha said...

beji,
saadar abhivaadan. bilkul saraltaa se seeddhe lafzon mein kaafee kuchh kehnaa aapkee khaasiyat hai. achha lagaa.

Parul said...

waah...ye baat mehsuusi jaa sakti hai bas....

mehek said...

bahut sundar

Udan Tashtari said...

बेहतरीन, बेजी.