उस दिन
टिकने दिया
आज तू फैला हुआ
विस्तार पर
अपना हक समझ
सोख कर
अपने पीलेपन को
लगातार
नम रखता हुआ...
जीवित ही था
सो कुचला नहीं...
जीने दिया....
नहीं तो...
कहाँ जड़े भी हैं
जो उखाड़ना पड़े....
बीन सकते हैं....
झटक दो अगर...
तो वजूद....
छीन सकते हैं.....
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5 comments:
आपकी इस कविता के आगे मैं कुछ लाइनें जोड़ रहा हूँ जो अभी-अभी अचानक बन पड़ी हैं
मेरा वजूद मुझसे अलग नहीं
इसका मुझे अहसास है
लेकिन ये वजूद पाने की चाह में
मैं अपना बाकी वजूद
खो रहा हूँ
खो रहा हूँ अपने बचे वजूद को
लेकिन ये भी एक मजबूरी है
अपने वजूद को पाने की,
उसे मिटाने की
कमलेश मदान
सुन्दर..
सुन्दर
beji,
saadar abhivaadan. aapke is amarbel se lipat kar hum bhee amar ho gaye.
बहुत खूब - [ बचपन में सुना था अमरबेल की जिजीविषा, उद्यम और पकड़ बहुत मज़बूत होते हैं - इतना आसान नहीं झटकना]
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