Monday, March 03, 2008

अमरबेल

उस दिन
टिकने दिया
आज तू फैला हुआ
विस्तार पर
अपना हक समझ
सोख कर
अपने पीलेपन को
लगातार
नम रखता हुआ...

जीवित ही था
सो कुचला नहीं...
जीने दिया....

नहीं तो...
कहाँ जड़े भी हैं
जो उखाड़ना पड़े....
बीन सकते हैं....

झटक दो अगर...
तो वजूद....
छीन सकते हैं.....

5 comments:

कमलेश मदान said...

आपकी इस कविता के आगे मैं कुछ लाइनें जोड़ रहा हूँ जो अभी-अभी अचानक बन पड़ी हैं

मेरा वजूद मुझसे अलग नहीं
इसका मुझे अहसास है
लेकिन ये वजूद पाने की चाह में
मैं अपना बाकी वजूद
खो रहा हूँ

खो रहा हूँ अपने बचे वजूद को
लेकिन ये भी एक मजबूरी है
अपने वजूद को पाने की,
उसे मिटाने की




कमलेश मदान

Udan Tashtari said...

सुन्दर..

आभा said...

सुन्दर

ajay kumar jha said...

beji,
saadar abhivaadan. aapke is amarbel se lipat kar hum bhee amar ho gaye.

जोशिम said...

बहुत खूब - [ बचपन में सुना था अमरबेल की जिजीविषा, उद्यम और पकड़ बहुत मज़बूत होते हैं - इतना आसान नहीं झटकना]