घड़ी की सूई देख
लम्हों का
हिसाब कर रहे हो....
उस दिन....
साँसों की
आवाजाही को
जिंदगी कह रहे थे....
साथ जो याद में
तब्दील हो रही है
ना जाने कैसे
मापोगे.....
आंकते समय
इकाई में हमेशा
भूल करते हो....
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POEMS IN HINDI moments....thoughts....emotions....analysis..... descriptions...reflections....expressions....impressions.....my words....my feelings
7 comments:
सही कहती हैं. जीवन भूलों का कैलेंडर भर होके ही तो रह गया है.. या भूलों को भूलते रहने की कहानी.. बैठे-बिठाये उदास कर दिया..
कविता बहुत अच्छी लगी. बाज़ार और खरीद मोल भाव की इतनी आदत हो जाती है कि जिंदगी की तेज पटरियों पर भागते हर बात को गिनना मापना स्वाभाविक सा लगने लगता है, जब तक कुछ अपना खो नहीं जाता.
सुनील
ये तो बहुत गहरी बात है - एक तरह से हमारे समय का जल्दी जल्दी बीतना... हम सब का जल्दी जल्दी बीतना - ह्म्म ...
अरे वाह... कितनी खूबसूरती से कह दी आपने इतनी गहरी बात... कहीं कुछ चुभ सा क्यों गया..
beji ,
aap kee dhar kee maar ke aage to hum mar hee jaate hain, kum magar bahut jyaadaa aur bahut hee jyaadaa gahraa.
सदा की तरह सुन्दर कविता बेजी की तरह !
घुघूती बासूती
आपसे यहाँ अचानक मुलाकात होगी ,सोचा नही था पर देखकर अच्छा लगा ,इस कविता ने मन मोह लिया .....आप अभी भी वैसी ही है .
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