Thursday, March 06, 2008

त्रुटि

घड़ी की सूई देख
लम्हों का
हिसाब कर रहे हो....

उस दिन....
साँसों की
आवाजाही को
जिंदगी कह रहे थे....

साथ जो याद में
तब्दील हो रही है
ना जाने कैसे
मापोगे.....

आंकते समय
इकाई में हमेशा
भूल करते हो....

7 comments:

Pramod Singh said...

सही कहती हैं. जीवन भूलों का कैलेंडर भर होके ही तो रह गया है.. या भूलों को भूलते रहने की कहानी.. बैठे-बिठाये उदास कर दिया..

Sunil Deepak said...

कविता बहुत अच्छी लगी. बाज़ार और खरीद मोल भाव की इतनी आदत हो जाती है कि जिंदगी की तेज पटरियों पर भागते हर बात को गिनना मापना स्वाभाविक सा लगने लगता है, जब तक कुछ अपना खो नहीं जाता.
सुनील

जोशिम said...

ये तो बहुत गहरी बात है - एक तरह से हमारे समय का जल्दी जल्दी बीतना... हम सब का जल्दी जल्दी बीतना - ह्म्म ...

पर्यानाद said...

अरे वाह... कितनी खूबसूरती से कह दी आपने इतनी गहरी बात... कहीं कुछ चुभ सा क्‍यों गया..

ajay kumar jha said...

beji ,
aap kee dhar kee maar ke aage to hum mar hee jaate hain, kum magar bahut jyaadaa aur bahut hee jyaadaa gahraa.

Mired Mirage said...

सदा की तरह सुन्दर कविता बेजी की तरह !
घुघूती बासूती

DR.ANURAG ARYA said...

आपसे यहाँ अचानक मुलाकात होगी ,सोचा नही था पर देखकर अच्छा लगा ,इस कविता ने मन मोह लिया .....आप अभी भी वैसी ही है .