कितना चाहती हूँ....?!
रंगों की बाल्टी में
कूची डुबो कर
तेरे आसमाँ को
रंगों से भर दूँ....
तू सोया हो जब
तेरी पलकों में लाकर....
सपनों को
इरादों में बसा दूँ....
डगमगाया हुआ
तेरा विश्वास हो तब....
आस्था की पकड़ से
तुझको सँभालू...
जो बोझिल हो पल
तो अपनी हँसी से.....
हल्का इसे कर....
पँख लगाकर उड़ा दूँ....
तेरे बच्चों की अम्मा...
सौगातों की झोली..
तू चाहे तभी...
फरिश्तों को बुला लूँ.....
.........................
और तुम..
कितना चाहते हो....?!
रंग भरते हुए
जो यह हो जायें खाली....
इरादें जो तेरा
कहना ना माने
आस्था के भी
जब कदम लड़खड़ाये
तू हँसना अगर
कभी भूल जाये...
मैं तब भी तुझे....
इतना ही चाहूँ.....
मेरी रूह तुझसे
ऐसे जुड़ी है
हर रूप में ...
तू मेरी सखी है....
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12 comments:
Beautiful.
बहुत अच्छे.. सच्चे?
beji g aapki kvita ne nihal kr diya...iske nshe me n jane kb tk duba rhoonga....badhaee bh, shukriya bhi
beji ,
ye aap kee kathputliyan nit naya naach karaatee hain hamse. waise hamein bhee naachne kee aadat see ho gayee hai.
bahut hi sundar
बहुत उम्दा..बढ़िया लगी.
बहुत भरा हे प्यार कठपुतलियों में। नहीं कोई जो जवाब दे, न कोई जवाब है।
डगमगाया हुआ
तेरा विश्वास हो तब....
आस्था की पकड़ से
तुझको सँभालू...
सुंदर भाव लिये आपकी कविता अच्छी लगी...बधाई
बढ़िया...
बेजी, पलकों में इरादे भरने का इरादा बड़ा प्यारा है। हां बेजी, जितने प्यारे भाव हैं, उसे सहलाते हुए उतने ही प्यारे शब्द भी हैं आपके पास। पर इस ब्लॉग में तस्वीरों की कमी मुझे थोड़ी खटकती है। कविताओं के मिजाज को छूती तस्वीरें आप लगाने लगें, तो सचमुच बेहद मज़ा आएगा।
तेरी पलकों में लाकर....
सपनों को
इरादों में बसा दूँ....
माशा-अल्लाह लफ्जों की जादूगरी कोई आपसे सीखे..आप सचमुच लाजवाब है मोहतरमा ..
kitna kuch kahna chahti hain aap. etne blog update karna bhi kahna hi hai. kavitain esa hi kuch kah rahi hai
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