Friday, March 07, 2008

तुलना

कितना चाहती हूँ....?!

रंगों की बाल्टी में
कूची डुबो कर
तेरे आसमाँ को
रंगों से भर दूँ....

तू सोया हो जब
तेरी पलकों में लाकर....
सपनों को
इरादों में बसा दूँ....

डगमगाया हुआ
तेरा विश्वास हो तब....
आस्था की पकड़ से
तुझको सँभालू...

जो बोझिल हो पल
तो अपनी हँसी से.....
हल्का इसे कर....
पँख लगाकर उड़ा दूँ....

तेरे बच्चों की अम्मा...
सौगातों की झोली..
तू चाहे तभी...
फरिश्तों को बुला लूँ.....

.........................

और तुम..
कितना चाहते हो....?!

रंग भरते हुए
जो यह हो जायें खाली....
इरादें जो तेरा
कहना ना माने
आस्था के भी
जब कदम लड़खड़ाये
तू हँसना अगर
कभी भूल जाये...

मैं तब भी तुझे....
इतना ही चाहूँ.....

मेरी रूह तुझसे
ऐसे जुड़ी है
हर रूप में ...
तू मेरी सखी है....

12 comments:

मीत said...

Beautiful.

Pramod Singh said...

बहुत अच्‍छे.. सच्‍चे?

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

beji g aapki kvita ne nihal kr diya...iske nshe me n jane kb tk duba rhoonga....badhaee bh, shukriya bhi

ajay kumar jha said...

beji ,
ye aap kee kathputliyan nit naya naach karaatee hain hamse. waise hamein bhee naachne kee aadat see ho gayee hai.

mehek said...

bahut hi sundar

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा..बढ़िया लगी.

दिनेशराय द्विवेदी said...

बहुत भरा हे प्यार कठपुतलियों में। नहीं कोई जो जवाब दे, न कोई जवाब है।

Reetesh Gupta said...

डगमगाया हुआ
तेरा विश्वास हो तब....
आस्था की पकड़ से
तुझको सँभालू...

सुंदर भाव लिये आपकी कविता अच्छी लगी...बधाई

अजित वडनेरकर said...

बढ़िया...

अनुराग अन्वेषी said...

बेजी, पलकों में इरादे भरने का इरादा बड़ा प्यारा है। हां बेजी, जितने प्यारे भाव हैं, उसे सहलाते हुए उतने ही प्यारे शब्द भी हैं आपके पास। पर इस ब्लॉग में तस्वीरों की कमी मुझे थोड़ी खटकती है। कविताओं के मिजाज को छूती तस्वीरें आप लगाने लगें, तो सचमुच बेहद मज़ा आएगा।

DR.ANURAG ARYA said...

तेरी पलकों में लाकर....
सपनों को
इरादों में बसा दूँ....

माशा-अल्लाह लफ्जों की जादूगरी कोई आपसे सीखे..आप सचमुच लाजवाब है मोहतरमा ..

vijay gaur said...

kitna kuch kahna chahti hain aap. etne blog update karna bhi kahna hi hai. kavitain esa hi kuch kah rahi hai