Monday, March 10, 2008

संयोग

बड़ी सी दुनिया के
छोटे से कोने में
धूल समेटती
रद्दी में पड़ी
एक पीले पुराने
पन्ने सी मिली....

खोये खजाने के
बक्से से गुम...
तहों में दबी...
कटे से किनारों में
खोई सी मिली....

मन के चित्र के
मानचित्र सी...
लक्ष्य की दिशा के
कम्पास सी
एक संदर्भ सी
संयोग सी मिली.....

..........................
ना जाने क्यों....
जब मिल गई
ऐसे लगा...
तलाश पूरी हुई......

6 comments:

mehek said...

मन के चित्र के
मानचित्र सी...
लक्ष्य की दिशा के
कम्पास सी
एक संदर्भ सी
संयोग सी मिली.....

bahut gehre bhav sundar

रचना said...

nicely expressed

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप की काव्यरचना क्षमता से अब ईर्ष्या सी होने लगी है।

DR.ANURAG ARYA said...

अजीब बात है न हरेक के पास होते है ऐसे संयोग......?

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

sundar... ati sundar...

जोशिम said...

बहुत अच्छे - पुरानी चिट्ठी ? कि पुरानी फोटो ? कि पुरानी मन की शान्ति - मनीष