सिरहाने पर
दिल रख कर
बाँह की गिरह में
बँध जाऊँ
धड़कन के खुरचने
पर सुलगूँ
लौ सी जलूँ
पिघल जाऊँ
तेरी कल्पना
स्वप्न सी मैं ढलूँ
बहकते बहकते
संभल जाऊँ
बेचैन अहसास के
शोर को
मूक सहमति में
दबा आऊँ....
गिरह की
सीमा के भीतर
अपना आसमाँ पकड़
छिपा आऊँ....
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4 comments:
कुछ भी खुरचिए मत ,बढिया .....
बहुत सुन्दर!!!
beji,
ye bataaiye ki ye appkee kalam kaa kamaal hai ya khud aapkaa, jiskaa bhee hai bus kamaal hai.
bahut hi sundar
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