Thursday, March 13, 2008

आलिंगन

सिरहाने पर
दिल रख कर
बाँह की गिरह में
बँध जाऊँ

धड़कन के खुरचने
पर सुलगूँ
लौ सी जलूँ
पिघल जाऊँ

तेरी कल्पना
स्वप्न सी मैं ढलूँ
बहकते बहकते
संभल जाऊँ

बेचैन अहसास के
शोर को
मूक सहमति में
दबा आऊँ....

गिरह की
सीमा के भीतर
अपना आसमाँ पकड़
छिपा आऊँ....

4 comments:

आभा said...

कुछ भी खुरचिए मत ,बढिया .....

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर!!!

ajay kumar jha said...

beji,
ye bataaiye ki ye appkee kalam kaa kamaal hai ya khud aapkaa, jiskaa bhee hai bus kamaal hai.

mehek said...

bahut hi sundar