Sunday, March 16, 2008

मणिभ

गरम बात को
सँभल कर
शब्दों में उतार आये......

थोड़ी पुड़िया में
बँधी समझ
उसमें
चला आये

देखा...
ठंडा पड़ने पर
आकार में
ढ़ल गया है.....

शब्द से
शब्द के
बीच के मौन में
सार मिल गया है

लगता है
जम गई....
आज
बात...बन गई...

7 comments:

अनूप शुक्ल said...

क्या रेसिपी है!

मीत said...

अच्छा !

mehek said...

lagta hai aaj baat ban gayi,bahut khub kaha hai.

अफ़लातून said...

क्या सधी हुई लय है !

Keerti Vaidya said...

har baar apko padh mein fresh ho jati hun...


really u write very well....

दिनेशराय द्विवेदी said...

जीवन में अनेक बार घटे अनुभव को इस कविता में समेट दिया। बधाई।

जोशिम said...

बहुत बढ़िया "शब्द से / शब्द के / बीच के मौन में/ सार मिल गया है" - मनीष