Monday, March 17, 2008

कागज़ के पँख

कागज़ से
अक्सर
पँख बनाने की कोशिश
की है....

पता नहीं...
पत्ते की तरह
बस हवा में
उतर जाते हैं...

मैं चाहती हूँ...
यह उड़ें
तितलियों की तरह....
हवा मे अठखेलियाँ करते

कभी पंक्ति में...
बादल से उलझे....
खुले गगन में
चहकते विचरते....

उलट पुलट कर
कई बार
देखती हूँ
इरादे से
कई बार
उछालती हूँ....

कभी रंग
भरकर
कभी आकार
बदलकर
उड़ान के लिये
तैयार करती हूँ...

फिर भी....
पता नहीं...
पत्ते की तरह
बस हवा में
उतर जाते हैं...

आकार है
विस्तार है
पर
हवा से
हार जाते हैं

कुछ तो है
जो यह उड़ान भरते नहीं
तूफाँ में...
ज़रा देर भी
हवा में
ठहरते नहीं...


शायद....

नसें गुम हैं
यह फडफडाते नहीं
उड़ान के उमंग की
रवानी नहीं....
आत्मा की कोई
कहानी नहीं
यह कोई चिड़िया
सयानी नहीं....

फटे हुए पन्ने
कटे हुए पत्ते
पँख अकेले
चाहे जितना धकेलें
कहीं ऐसा तो नहीं
.........यह उड़ान नहीं .....

6 comments:

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

नसें गुम हैं
यह फडफडाते नहीं
उड़ान के उमंग की
रवानी नहीं....
आत्मा की कोई
कहानी नहीं
यह कोई चिड़िया
सयानी नहीं....

saTeek ewam saty! sanvedansheel kaavy!

अफ़लातून said...

छोटी-सी पर सयानी ।

DR.ANURAG ARYA said...

Aisa lagta hai tab aapko pahchanta tha ab janne bhi laga hun....

ajay kumar jha said...

baap re kaagaz ke pank hain to itnaa door tak udtee jaa rahee hain doosre hote to na jaane kya kartee.

मीत said...

वाह ! बहुत बढ़िया ?? क्या बात है.

दिनेशराय द्विवेदी said...

उड़ान नहीं,
उसकी संकल्पना है।
जिस के बिना
उड़ान का अस्तित्व नहीं।