Saturday, March 22, 2008

पारस


सूरज की एक किरण
लहर से उलझ गई
रंग में बिखर कर....
भीतर उतर गई...
मीन पर रजत सी
कंकड़ से सिमट गई.....
कभी बुलबुले सी
मोती सी पनप गई

बस जिसे...
छू गई...
रजत रंग संवर गई
लहर पर थिरक गई...
किरण सी चमक गई
प्रकाश सी ढ़ल गई

1 comments:

Mrs. Asha Joglekar said...

यह कविता किरण सी मन आँगन उतर गई ।