Sunday, March 23, 2008

उदास घटा


आज रात
पिछवाड़े से
उस बदली तक,
एक पगडंडी
लेनी है...

कई दिन से
वो पगली
सूरज को
पकड़ कर बैठी है

....शायद...

अंतरंगता से
मेरे दामन में
वो रो ले.....

और सुबह
सूरज फिर
अलवण किरण की
रौशनी से खेले...

3 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप को बरसात भी चाहिए और सूरज भी। दोनों मिलेंगे।

अबरार अहमद said...

अच्छा लिखती हैं आप। लिखते रहिए

mehek said...

badal aur suraj ko hi ek kar diya jaye to,bahut hi khubsurat baat kahi hai aapne.