Wednesday, March 26, 2008

प्रबोध

थोड़ी सी धूप
अनमनी सी छनी
उस सूराख से
मन में....

अँधेरों में गुम
नन्हे से कण
उजाले पहन
जहन में.....

धडकनों की धुन पर
नब्ज़ में चल रहे
एक नये सुर में
तन में
..................

सूराख बंद कर
धूप को रोक दो
फिर जुटो...रूह के
दमन में

कहीं रूह...मिल गई
रौशनी से....फिर
क्या रहेगा
कण कण में ?!!

8 comments:

mehek said...

man ke jharoke ki raoushani sada jalti rahi,sach ruh ek din us roushni se milni hi hai magar,aur kan kan mein bas rahega shayad intazaar,bahut hi sundar bhav hai kavita ka aur shabdon ka chayan bahut khubsurat,dhadkan ,nabz,(heartbeat,pulse)very very well flowing in the rhythm of poem.very nice one.

बोधिसत्व said...

आप हर दम अच्छा लिखती हैं.....लिखती रहें...

Udan Tashtari said...

सूराख बंद कर
धूप को रोक दो


---वाह!!! हमेशा की तरह बेहतरीन!!!

जोशिम said...

बहुत ही बढिया बेजी - आरोह भी अवरोह भी - मनीष

दिनेशराय द्विवेदी said...

वाह! एक और जानदार कविता।

सुनीता शानू said...

वाह क्या रचना है! सुन्दर अभिव्यक्ती...

DR.ANURAG ARYA said...

सूराख बंद कर
धूप को रोक दो
फिर जुटो...रूह के
दमन में

बहुत खूब....

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

just wonderful!