Thursday, March 27, 2008

शरीक

तुमने सोचा
दर्द छिपा कर रखोगे
मेरे सामने
मुस्कुराते रहोगे
मेरी चमक पर
आँच आये ना कोई
मुझे दूर ही
सँभाले रखोगे......

नहीं जानते क्या
इतना अभी भी....?!
मेरी चमक...
ओस सी ही नमी है....!
सीप सी ही है
हस्ती मेरी हमेशा...।
दर्द बाँटोगे ना तो...
कैसे मोती रचूँगी....?!

7 comments:

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

क्या बात है..बहुत खूब..सचमुच 'मोती' हैं

अनूप भार्गव said...

बुझ गये हैं दीप वो ज्योति बनेंगे
दर्द के आंसू ही कल मोती बनेंगे

-- सुन्दर कविता के लिये बधाई ..

pramod kumar kush 'tanha' said...

behad khoobsurat khayal aur adaaygee hai. jitni taarif kee jaaye kam hai.lekhnee yuun hee chaltee rahey , maa saraswati se yahee kaamna hai.

abhinandan...

- p k kush 'tanha'
http://pramodkumarkush.blogspot.com

Udan Tashtari said...

बहुत सुन्दर ...

अफ़लातून said...

आँच से भी काँच में चमक आती है ,सुना है ।

DR.ANURAG ARYA said...

"ADHBHUT"

जोशिम said...

वाह - सीप के मोती