मोड़ पर हमेशा
गति धीमी
पड़ जाती है.....
हर बार
यहीं आकर
कुछ अटक सी
जाती है......
तजुर्बा भी
कहाँ रफ्तार बढ़ा
पाता है
यादों की स्मृति
घुटन सा जकड़
जाती है.....
............................
आज यादों से
कुछ दूरी
बनानी होगी....
रफ्ता रफ्ता
रफ्तार
बढ़ानी होगी
यह मोड़ ज़रा
जल्दी गुजर जाये
अगर.....
तो शायद
आसां
हो जायेगा.....सफर
भौतिक-विज्ञान में हमेशा रुचि रही है। बैन्किंग एफेक्ट भी हमारे जीवन में प्रासंगिक है। मोड़ पर एक सीमा के आगे गति नहीं बढ़ाई जा सकती। अगर गति बढ़ानी हो तो रेडियस.....वृत्त की गोलाई ही बढ़ानी पड़ती है। केन्द्र का आकर्षण, मोड़ लेने वाली चीज़ का 'मास' और 'इनर्शिया', 'फ्रिक्शन'...यह सभी इस सीमा को निर्धारित करते हैं। सुजाता की टिप्पणी के बाद यह टीप जोड़ रही हूँ। कुछ आलस...कुछ यूँ ही...अपनी कवितायें समझाने की जहमत अक्सर नहीं उठाती। :))
Friday, March 28, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)




9 comments:
अच्छा तो आजकल ज्यामितीय और अकाउंटिंग के साथ कविता के प्रयोग चल रहे हैं ।सही है जी !
सफर के लिये शुभकामनाऐं. रचना सुन्दर बन पड़ी है.
hmmmmm bahut hi badhiya
पर केन्द्र की और आपका झुकाव (एंगल ऑव बैंकिंग) भी तो मायने रखता है.
रचना सुंदर है. बधाई.
kavitaa agar samjhaayi jaaye to kavita kya ?...bhaav acchhey lagey
आपको अपनी कविता समझाने की जरूरत ही नही है.वो तो खुद-ब-खुद दिल में जगह बना लेती है.पहली बार आपके ब्लौग पर आयी, अच्छा लगा.
हो जायेगा? सफ़र? शुरू?.. देखते हैं?
बेजी जी ,
हम तो नालायक है जी ! आपको क्या लगता है आपके समझाने के बाद भी हम समझ गयी हूँ ;-)
कविता के मामले में मोटी बुद्धि है जी ,और विज्ञान के मामले में तो है ही ,अं..अं गणित के मामले में भी है ...और .....
अब क्या क्या बताऊँ ।
Post a Comment