Monday, March 24, 2008

दूरी

किसी वृत्त में
दो बिंदु की तरह मिले....
पास पास
मैं आगे थी...वो पीछे...
अजीब जिद थी
कि बीच का फासला
मैं तय करूँ...
...
और बस यूँ ही
फासले बढ़ गये

12 comments:

Udan Tashtari said...
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mehek said...

aj bhi samaj ka sach yahi hai,bahut satik ta se likha hai,bahut badhai.

अफ़लातून said...

एक वृत्त पर आगे-पीछे कैसे तय होते होंगे ?

Beji said...

अफ़लातून जी,

अच्छा किया जो पूछा...गति की दिशा से....

Deepak Bhanre said...

bahut accha likha hai , dhaynabaad .

Deepak Bhanre said...

bahut badhiya likha hai aapne. dhanyabaad.

Deepak Kumar Bhanre
deep-007.blogspot.com

swati said...

bahut sundar

अरुण said...

वॄत मे मिले
दो बिंदुओ की तरह
ना वो पास ,
ना मै दूर
ना वो तेज चलने को राजी
ना मै धीरे
और बस यू ही
जिंदगी तमाम गुजर गई

राकेश खंडेलवाल said...

तुम मिले, ऐसे मिले, मिल के फिर कभी न मिले
ज़िक्र होता है सुबह-शाम, यही क्या कम है ?

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया.

जोशिम said...

बहुत ही बहुत खूब डाक्साब - [p.s. शुक्र है मोबिअस स्ट्रिप पर नहीं रहे [:-) ]

अनूप भार्गव said...

अगर तुम्हारी ज़िद है
कि फ़ासला मै ही तय करूँ
तो वायदा करो
तुम मेरा इन्तज़ार करोगे ,
मैं ही कुछ तेज चल लेती हूँ
हम दोनों वृत्त में हैं ना
दूरी पहले तो बढेगी
फ़िर धीरे धीरे
मैं तुम में विलीन हो जाऊँगी ।

परिधि की अगली परिक्रमा
साथ करने का वायदा रहा ।