मुझे यकीं है की
वक्त की रफ्तार
बदलती है....
नहीं तो तुम्ही बताओ...
कुछ पड़ाव से जल्दी...
कुछ पर क्यों
रुक रुक गुजरता है...??
कहते हैं..
वक्त लौट कर आता नहीं....
फिर तुम्हारी आँखों में
वही शाम क्यों बार बार
दिखती है.....??
हमने तो...
वक्त को अक्सर...
वक्त से जूझते देखा......
घुटनों पर...
मोहलत की
दुआ माँगते देखा.....
सालों को ..
चुटकी में गुजरते देखा...
लम्हों में युगों को
सिमटते देखा
ना जाने किसने
अफवायें यह
फैलाई हैं........
हमने तो...
हमेशा इसे .....
पीछे मुड़कर आते देखा.....
हाँ यह बात और है...
लौटकर वह हमेशा
खामोश रहा है........
नहीं तो
इसकी बोलती आँखों को
हमेशा नम देखा.....
Wednesday, April 02, 2008
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3 comments:
वाह....खुबसूरत
सुन्दर !
इसकी बोलती आँखों को
हमेशा नम देखा.....
pate ki bat..
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