जैसे कोई
सपना हो जीवन
झाँकियाँ
बदलती हुई
पल पल....
किसी कसी हुई रस्सी पर
चलते हुए
हाथ में लठ.....
और फिर
फिसल सँभल......
डर लगता है...
और बुदबुदाते हुए
होठों को
छू जाता है
माँ का आँचल
सँभल जाता है मन
फिर एक बार नींद में....
पर हर बार नहीं....
कभी पाँव फिसल....
बहुत ऊँचाई से
गिरता है....
माँ नहीं सुनती.....
नींद नहीं खुलती....
पास बैठकर
हँसते हुए
कोई नहीं पूछता....
सपना देख रही थी....?!
गिर कर खाई चोट का
अँदाज़ा लगाने से पहले
फिर बदल जाता है दृष्य
नई झाँकियाँ
हँसती हुई
भागती हुई
कुछ जबरन
मुस्कुराती हुई.....
होती है
गुदगुदी सी...
किलकिलाते हुए
बदल लेती हूँ
करवट
फिर एक बार......
कच्ची सी नींद
सपनों की कतार....
लगता है
बस अब छोर
और फिर
जाग जाऊँ.....
पर कहाँ...
टूटती नींद में से
फिर उभरता है सपना कोई....
फिर गोते
फिर डुबकी.....
ना जाने
कितनी बार.....
और....
ना जाने
कितनी देर....
और..........
Subscribe to:
Post Comments (Atom)




4 comments:
very nice !!
very nice blog !!
Dreams. May they never desert us. acchha likha hai.
अच्छे सपने देखना अच्छा है - बहुत अच्छा है - २००८ का अर्ध शतक मब्रूक
Post a Comment