Saturday, April 05, 2008

इल्यूशन्स

जैसे कोई
सपना हो जीवन
झाँकियाँ
बदलती हुई
पल पल....

किसी कसी हुई रस्सी पर
चलते हुए
हाथ में लठ.....
और फिर
फिसल सँभल......
डर लगता है...
और बुदबुदाते हुए
होठों को
छू जाता है
माँ का आँचल

सँभल जाता है मन
फिर एक बार नींद में....

पर हर बार नहीं....
कभी पाँव फिसल....
बहुत ऊँचाई से
गिरता है....
माँ नहीं सुनती.....
नींद नहीं खुलती....
पास बैठकर
हँसते हुए
कोई नहीं पूछता....
सपना देख रही थी....?!


गिर कर खाई चोट का
अँदाज़ा लगाने से पहले
फिर बदल जाता है दृष्य

नई झाँकियाँ
हँसती हुई
भागती हुई
कुछ जबरन
मुस्कुराती हुई.....

होती है
गुदगुदी सी...
किलकिलाते हुए
बदल लेती हूँ
करवट
फिर एक बार......

कच्ची सी नींद
सपनों की कतार....
लगता है
बस अब छोर
और फिर
जाग जाऊँ.....

पर कहाँ...
टूटती नींद में से
फिर उभरता है सपना कोई....
फिर गोते
फिर डुबकी.....

ना जाने
कितनी बार.....
और....
ना जाने
कितनी देर....
और..........

4 comments:

अमिताभ फौजदार said...

very nice !!

amitabh said...

very nice blog !!

मीत said...

Dreams. May they never desert us. acchha likha hai.

जोशिम said...

अच्छे सपने देखना अच्छा है - बहुत अच्छा है - २००८ का अर्ध शतक मब्रूक