Sunday, April 06, 2008

रूपान्तर

सोचती हूँ
किस तरह
नमी जो मिली
जड़ो से सोंक
अपनी धमनियों में
दौड़ा कर
लाल रंग बना....
फूल पर चड़ा दूँ....

हर रोज़ कहाँ
आँसू मिलते हैं.....!!

3 comments:

जोशिम said...

बहुत ही बढ़िया - क्या गुलाब क्या रजनीगंधा - [p.s. - (१) शायद धमनियों होना चाहिए दमनियों की जगह (२) शिराओं के नीले में भी गुन्जाइश है ]

Udan Tashtari said...

क्या बात है!! बहुत खूब!

mehek said...

लाल रंग बना....
फूल पर चड़ा दूँ....

हर रोज़ कहाँ
आँसू मिलते हैं.....!!
wah bahut hi behtarin