जिन्दगी थोड़ी जल्दी में
लगती है....
मेरे सामने
लम्हा लम्हा
ख्यालों का ढ़ेर
लगा देती है....
उसे जज़्बात
के अलग अलग मुखौटे
पहना देती है.....
और फिर
मुँह चिढ़ा कर कहती है....
चुनो.....
हिचकिचाते हुए....
जज़्बों को
नज़रअंदाज़ कर
ख्याल चुन आती हूं.....
थोड़ा डरती हूँ...
क्योंकि
ज़रा देर में
मैं वही
ख्याल बन जाती हूँ......
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5 comments:
बढ़िया//
jara der mein main vahi khayal ban jati hun bahut hi badhiya.
हिचकिचाते हुए....
जज़्बों को
नज़रअंदाज़ कर
ख्याल चुन आती हूं.....
बहुत बढ़िया.. कम शब्दो में गहरी बात कही है आपने... बधाई
निशब्द हूँ ?
कविता की कविता - बड़ी अनूठी -rgds - manish
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