Monday, April 07, 2008

चयन

जिन्दगी थोड़ी जल्दी में
लगती है....

मेरे सामने
लम्हा लम्हा
ख्यालों का ढ़ेर
लगा देती है....
उसे जज़्बात
के अलग अलग मुखौटे
पहना देती है.....
और फिर
मुँह चिढ़ा कर कहती है....
चुनो.....

हिचकिचाते हुए....
जज़्बों को
नज़रअंदाज़ कर
ख्याल चुन आती हूं.....

थोड़ा डरती हूँ...
क्योंकि
ज़रा देर में
मैं वही
ख्याल बन जाती हूँ......

5 comments:

Udan Tashtari said...

बढ़िया//

mehek said...

jara der mein main vahi khayal ban jati hun bahut hi badhiya.

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

हिचकिचाते हुए....
जज़्बों को
नज़रअंदाज़ कर
ख्याल चुन आती हूं.....

बहुत बढ़िया.. कम शब्दो में गहरी बात कही है आपने... बधाई

DR.ANURAG ARYA said...

निशब्द हूँ ?

जोशिम said...

कविता की कविता - बड़ी अनूठी -rgds - manish