Tuesday, April 08, 2008

रात भर


पूरी रात खींच कर
बाँध दो.....
आधी रात को
उसके बाद लो....
थोड़ी ओढ़ लो
थोड़ी बाँट लो
थोड़ी बच गई...
सोचो क्या करो

इस करवट को
तुम रखो.....
उस तरफ की
मुझको दो....
पलक में सपना
पाल कर
थोड़े चाँद सितारे
उतार लो

प्यार से फिर प्यार को
स्पर्श से छू सको
बीच में यह पल सके...
रूह से थोड़ा नूर दो.....
थोड़ी लाज में
जो डूबी तो
थोड़ा नाज से....
उभार लो.....

साथ को साज को
रूप दो...सार दो.....

बाँधी हुई रात को...
आसमाँ से उतार दो
प्यार को निखार कर....
सुबह फिर संसार दो......

11 comments:

shubhashish said...

nice one!

vijay gaur said...

जीवन का खूबसूरत संगीत है इन पंक्तियों में -
बाँधी हुई रात को...
आसमाँ से उतार दो
प्यार को निखार कर....
सुबह फिर संसार दो......
अच्छी हैं.

mehek said...

kya baat hai wah,raat ko asmaan se utarne wala khayal bahut pasand aaya,behtarin ,bahut sundar.

Udan Tashtari said...

अरे वाह!! बहुत बढ़िया.

Parul said...

वाह! आपकी विधा से बिल्कुल अलग सी रचना है ये……बहुत बहुत खूबसूरत बात कही आज आपने--कितनी रूमानी---

राकेश खंडेलवाल said...

चाँद तू जरा ठहर
अभी तो शेष हैं प्रहर
ये रश्मि गंध लाई है
गुलाबी रात आई है
निहार लूँ
सँवार लूँ
बुहार लूँ

जोशिम said...

जय हो - नई रंग की कविता की - ऐसे ही बढे आपका समय हो

दिनेशराय द्विवेदी said...

यह वास्तविक कविता है। गाती, नाचती ठुमकती हुई।

Raviratlami said...

आपकी सुंदर, नए तेवर की कविता के साथ राकेश जी की टिप्पणी पर उतनी ही सुंदर कविता की जुगलबंदी - भई वाह!

रात तो सचमुच किसी रूमानी शाम की तरह गुलाबी हो गई !

मीत said...

बहुत अच्छी कविता. वाह !

Keerti Vaidya said...

bhut khoob