
पूरी रात खींच कर
बाँध दो.....
आधी रात को
उसके बाद लो....
थोड़ी ओढ़ लो
थोड़ी बाँट लो
थोड़ी बच गई...
सोचो क्या करो
इस करवट को
तुम रखो.....
उस तरफ की
मुझको दो....
पलक में सपना
पाल कर
थोड़े चाँद सितारे
उतार लो
प्यार से फिर प्यार को
स्पर्श से छू सको
बीच में यह पल सके...
रूह से थोड़ा नूर दो.....
थोड़ी लाज में
जो डूबी तो
थोड़ा नाज से....
उभार लो.....
साथ को साज को
रूप दो...सार दो.....
बाँधी हुई रात को...
आसमाँ से उतार दो
प्यार को निखार कर....
सुबह फिर संसार दो......




11 comments:
nice one!
जीवन का खूबसूरत संगीत है इन पंक्तियों में -
बाँधी हुई रात को...
आसमाँ से उतार दो
प्यार को निखार कर....
सुबह फिर संसार दो......
अच्छी हैं.
kya baat hai wah,raat ko asmaan se utarne wala khayal bahut pasand aaya,behtarin ,bahut sundar.
अरे वाह!! बहुत बढ़िया.
वाह! आपकी विधा से बिल्कुल अलग सी रचना है ये……बहुत बहुत खूबसूरत बात कही आज आपने--कितनी रूमानी---
चाँद तू जरा ठहर
अभी तो शेष हैं प्रहर
ये रश्मि गंध लाई है
गुलाबी रात आई है
निहार लूँ
सँवार लूँ
बुहार लूँ
जय हो - नई रंग की कविता की - ऐसे ही बढे आपका समय हो
यह वास्तविक कविता है। गाती, नाचती ठुमकती हुई।
आपकी सुंदर, नए तेवर की कविता के साथ राकेश जी की टिप्पणी पर उतनी ही सुंदर कविता की जुगलबंदी - भई वाह!
रात तो सचमुच किसी रूमानी शाम की तरह गुलाबी हो गई !
बहुत अच्छी कविता. वाह !
bhut khoob
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