अँजली में धूप मिली
थोड़ी हवा में
सिली सिली
अपना बनाने को
मुट्ठी ना बाँधों...
कहीं शिथिल ना हो जायें...
इसकी पँखुड़ियाँ
खिली खिली.........
..........
रौशन करो रूह....
थोड़ा तपो.....
तप से .....सूरज
मन में धरो.......
इस तरह धूप को
अपना करो....
सच यह अपना
सपना करो.....
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5 comments:
चलिये, बनाइये मत, सब आपकी तरह ऐसे होशियार नहीं..
Good one !
वाह --बार बार पढ़ने जैसे भाव
aaj kuch alag mood hai?
धूप /क्या कहीं रुकती ? / घड़ी को बाँध आगे / हर शाम /जा छुपती / मन में रुके / बस छाँव
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