Wednesday, April 09, 2008

हासिल

अँजली में धूप मिली
थोड़ी हवा में
सिली सिली
अपना बनाने को
मुट्ठी ना बाँधों...
कहीं शिथिल ना हो जायें...
इसकी पँखुड़ियाँ
खिली खिली.........

..........
रौशन करो रूह....
थोड़ा तपो.....
तप से .....सूरज
मन में धरो.......
इस तरह धूप को
अपना करो....
सच यह अपना
सपना करो.....

5 comments:

Pramod Singh said...

चलिये, बनाइये मत, सब आपकी तरह ऐसे होशियार नहीं..

Nishpaksh said...

Good one !

Parul said...

वाह --बार बार पढ़ने जैसे भाव

DR.ANURAG ARYA said...

aaj kuch alag mood hai?

जोशिम said...

धूप /क्या कहीं रुकती ? / घड़ी को बाँध आगे / हर शाम /जा छुपती / मन में रुके / बस छाँव