आरंभ से अंत के
निरंतर से अनंत के बीच
एक निरंकुश पल
की तलाश....
जो चरम पर
परम तक
होकर भी...
भूत और भविष्य से
निरपेक्ष हो
एक परिशुद्ध,
सुनिश्चित्त
दृढ़ पल
जिसमें निरीह,
निर्दोष अनुभव....
आज भी ....
संभव हो.....
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5 comments:
बढ़िया भाव.
shayad hum sabjo talash rahe hai aaramb se annt tak mile shayad sambhav ho,bahut badiya kavita hai beji ji
एक परिशुद्ध,
सुनिश्चित्त
दृढ़ पल
जिसमें निरीह,
निर्दोष अनुभव....
आज भी ....
संभव हो.....
उत्तम........आशावादी........खूबसूरत.......
बेजी आप इतने सुन्दर भाव कहां से लाती हैं, हमेशा की तरह बहुत ही सुन्दर रचना।
यही तो कविता है डाक्साब - निरंतर से अनंत के बीच का एक निरंकुश पल जो चरम पर परम तक
होकर भी भूत और भविष्य से निरपेक्ष है - क्या कहती हैं ?
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