Tuesday, April 15, 2008

शाश्वत

आरंभ से अंत के
निरंतर से अनंत के बीच
एक निरंकुश पल
की तलाश....

जो चरम पर
परम तक
होकर भी...
भूत और भविष्य से
निरपेक्ष हो

एक परिशुद्ध,
सुनिश्चित्त
दृढ़ पल
जिसमें निरीह,
निर्दोष अनुभव....
आज भी ....
संभव हो.....

5 comments:

Udan Tashtari said...

बढ़िया भाव.

mehek said...

shayad hum sabjo talash rahe hai aaramb se annt tak mile shayad sambhav ho,bahut badiya kavita hai beji ji

DR.ANURAG ARYA said...

एक परिशुद्ध,
सुनिश्चित्त
दृढ़ पल
जिसमें निरीह,
निर्दोष अनुभव....
आज भी ....
संभव हो.....


उत्तम........आशावादी........खूबसूरत.......

neelima sukhija arora said...

बेजी आप इतने सुन्दर भाव कहां से लाती हैं, हमेशा की तरह बहुत ही सुन्दर रचना।

जोशिम said...

यही तो कविता है डाक्साब - निरंतर से अनंत के बीच का एक निरंकुश पल जो चरम पर परम तक
होकर भी भूत और भविष्य से निरपेक्ष है - क्या कहती हैं ?