Wednesday, April 16, 2008

नि:शब्द

कई बार
मौन को
अपने शब्दों के बीच रख
उक्ति में
अर्थ भरा है.....

आज आकुल मौन के
अनुवाद के लिये
अक्षर अपरित्याज्य है....

इनकी खामोशी में...
अभीष्ट अर्थ
लुप्त हो रहे हैं....

8 comments:

अफ़लातून said...

अच्छा मौन,
मनन करता.

Udan Tashtari said...

बहुत गहरी!

Pramod Singh said...

जीवन में डर तो घड़ी-घड़ी लगता ही रहता है, मगर फ़ि‍लहाल जो है वह आपकी अपरित्‍याज्‍य, अभीष्‍ट जैसी क्लिष्‍ट बुनावट से लग रहा है.. और यह भी भारी-भारी आप मौन के बारे में बोलते हुए बोल रही हैं.. वाचाल होंगी फिर हमारे हाल क्‍या होंगे?

Beji said...

प्रमोदजी,

सही है...इस बुनावट से बहुत सहज मैं भी नहीं...किन्तु जो कहना था उसके लिये इनसे उपयुक्त शब्द भी नहीं ढूँढ पाई

Gyandutt Pandey said...

अर्थ तो मौन और कोलाहल में बहुधा एक से ही मिलते हैं। कभी व्यक्ति सुनता है, कभी नहीं सुनता।

rakhshanda said...

khaamosh paighaam

DR.ANURAG ARYA said...

आपका मौन भी उतना ही खूबसूरत है जितने आपके शब्द ....

vikasgoyal said...

Aaaj pehli baar aapke blog padha Beji Bahut achha lagaa. Abhi saari kavitaayein nahin padh opaaaya hoon parantu jo padhi hai bahut achhi aur gehri lagi...