
बड़ी उमंगों से बोया था
वह ख्वाब का बीज
नमी वहाँ थी...
ज़मीं वहाँ थी
पड़े उजाले कम....
विचारो की शाखा में
एक झरोखा बना दो....
उजालों को उतारो
ज़मी पर फिर चला दो....
कहीं कोई नया अंकुर
कोई कोंपल जगा दो...
हाथ को हाथ में थाम
थोड़ी ज़मी लगा लो
गिरह बना ....
.. एक जंगल उगा लो....
उजालों को आ जाने दो
ख्वाबों को फिर लगा लो...




7 comments:
बहुत दिनों बाद आप की कविता का रसास्वादन किया। ताजगी बहुत है। अपील रोशनी के लिए बहुत जानदार लगी।
उजालों को आ जाने दो
ख्वाबों को फिर लगा लो...
--वाह!!
क्या बात है.
विचारो की शाखा में
एक झरोखा बना दो....
उजालों को उतारो
ज़मी पर फिर चला दो....
कहीं कोई नया अंकुर
कोई कोंपल जगा दो...
बेहतरीन रचना..
***राजीव रंजन प्रसाद
itni saadgi se mun chhuu jaana...badi khuubsurat adaa hai aapki lekhni kii....
उजालों को आ जाने दो
ख्वाबों को फिर लगा लो...
बहुत अच्छी पक्तियाँ !
बहुत भावपूर्ण रचना...बधाई.
नीरज
Post a Comment