Monday, April 28, 2008

फसल


बड़ी उमंगों से बोया था
वह ख्वाब का बीज
नमी वहाँ थी...
ज़मीं वहाँ थी
पड़े उजाले कम....


विचारो की शाखा में
एक झरोखा बना दो....
उजालों को उतारो
ज़मी पर फिर चला दो....
कहीं कोई नया अंकुर
कोई कोंपल जगा दो...
हाथ को हाथ में थाम
थोड़ी ज़मी लगा लो
गिरह बना ....
.. एक जंगल उगा लो....

उजालों को आ जाने दो
ख्वाबों को फिर लगा लो...

7 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

बहुत दिनों बाद आप की कविता का रसास्वादन किया। ताजगी बहुत है। अपील रोशनी के लिए बहुत जानदार लगी।

Udan Tashtari said...

उजालों को आ जाने दो
ख्वाबों को फिर लगा लो...

--वाह!!

मीत said...

क्या बात है.

राजीव रंजन प्रसाद said...

विचारो की शाखा में
एक झरोखा बना दो....
उजालों को उतारो
ज़मी पर फिर चला दो....
कहीं कोई नया अंकुर
कोई कोंपल जगा दो...

बेहतरीन रचना..

***राजीव रंजन प्रसाद

Parul said...

itni saadgi se mun chhuu jaana...badi khuubsurat adaa hai aapki lekhni kii....

अभिषेक ओझा said...

उजालों को आ जाने दो
ख्वाबों को फिर लगा लो...

बहुत अच्छी पक्तियाँ !

नीरज गोस्वामी said...

बहुत भावपूर्ण रचना...बधाई.
नीरज