
कंचे से कंचे पर
निशाना साधेंगे तो
क्या वह पल
जो समय की परत के नीचे
जमा है....
पिघल जायेगा....?!
फिर बुलबुला बन...
दो क्षण के लिये ही सही
ठहल पायेगा...
वो गुलाबी नीले से होकर
गुजर जायेगा...
........
बस एक बार फिर
इन कंचों में
क्या इंद्रधनुष
साँस ले ...
सुकून से सो पायेगा....?!!




9 comments:
तो कलम की खामोशी टूट ही गई..सुंदर कविता...
beji,
saadar abhivaadan, aapko padhnaa hameshaa hee achha lagtaa hai mujhe hee nahin shaayad sabko .
कंचे से कंचे पर निशाना साधते हुए ध्यान भंग हुआ तो निशाना सध ही न पायेगा.
hamesha ki tarah khoobsurat
bahut sundar
रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुरै जुरै गाँठ परि जाय।।
कंचे पर निसाना साधते समय उसमें बसा indradhanush तो हमेशा देखा, पर इस नज़र से कभी नहीं :-)
बढ़िया.
वाह बहुत सुंदर अभिव्यक्ति..
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