Tuesday, April 29, 2008

पुन:


कंचे से कंचे पर
निशाना साधेंगे तो
क्या वह पल
जो समय की परत के नीचे
जमा है....
पिघल जायेगा....?!
फिर बुलबुला बन...
दो क्षण के लिये ही सही
ठहल पायेगा...
वो गुलाबी नीले से होकर
गुजर जायेगा...
........
बस एक बार फिर
इन कंचों में
क्या इंद्रधनुष
साँस ले ...
सुकून से सो पायेगा....?!!

9 comments:

DR.ANURAG ARYA said...

तो कलम की खामोशी टूट ही गई..सुंदर कविता...

ajay kumar jha said...

beji,
saadar abhivaadan, aapko padhnaa hameshaa hee achha lagtaa hai mujhe hee nahin shaayad sabko .

vijay gaur said...

कंचे से कंचे पर निशाना साधते हुए ध्यान भंग हुआ तो निशाना सध ही न पायेगा.

neelima sukhija arora said...

hamesha ki tarah khoobsurat

mehek said...

bahut sundar

दिनेशराय द्विवेदी said...

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुरै जुरै गाँठ परि जाय।।

अभिषेक ओझा said...

कंचे पर निसाना साधते समय उसमें बसा indradhanush तो हमेशा देखा, पर इस नज़र से कभी नहीं :-)

Udan Tashtari said...

बढ़िया.

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

वाह बहुत सुंदर अभिव्यक्ति..