Friday, May 02, 2008

तृष्णा


रात तो बीत गई....
और वो धूप को
बंद आँखों के भीतर से देख
बार बार
आँख मल
जगने की कोशिश करता है...
..........................
सुलगी हुई धूप
सूखी उँगलियों से
झकझोर कर
फिर जगा देती हैं
एक प्यास


होंठ पर जीभ फेर
सूखी हवा को चख
एक बार फिर तरस
नीम बेहोशी ओढ़
अपने में ही सिंकुड़
सो जाता है
.........
वो अंकुर...
प्रस्फुटित होने से पहले
.....फिर से
बीज में

9 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

बेजी! बहुत भयानक कविता है यह। लेकिन जीवन और मृत्यु के सच से सीधे साक्षात्कार कराने वाली।

आलोक said...

पानी की प्यास तो आजकल बहुत लग रही है - इतनी गर्मी जो है !

Udan Tashtari said...

बहुत गहराई है यहाँ.

mehek said...

होंठ पर जीभ फेर
सूखी हवा को चख
एक बार फिर तरस
नीम बेहोशी ओढ़
अपने में ही सिंकुड़
सो जाता है
bahut gehri baat,kuch tis utha deti hai,badhai

अफ़लातून said...

फिर से प्रस्फुटित होने के पहले !

Beji said...

अफ़लातूनजी,
फिर से सो जाता है प्रस्फुटित होने के पहले ...

neelima sukhija arora said...

bahut gehri kavita beji

rakhshanda said...

सुलगी हुई धूप
सूखी उँगलियों से
झकझोर कर
फिर जगा देती हैं
एक प्यास

नज्म की ये लाईनें दिल को छू गयीं...बहुत खूब...
बहुत गहराई है इस के meaning में

kusumtripathi said...

very nicely expressed. Nice blog. Everyone should read it.


Dr. Kusum
Nagda