
रात तो बीत गई....
और वो धूप को
बंद आँखों के भीतर से देख
बार बार
आँख मल
जगने की कोशिश करता है...
..........................
सुलगी हुई धूप
सूखी उँगलियों से
झकझोर कर
फिर जगा देती हैं
एक प्यास
होंठ पर जीभ फेर
सूखी हवा को चख
एक बार फिर तरस
नीम बेहोशी ओढ़
अपने में ही सिंकुड़
सो जाता है
.........
वो अंकुर...
प्रस्फुटित होने से पहले
.....फिर से
बीज में




9 comments:
बेजी! बहुत भयानक कविता है यह। लेकिन जीवन और मृत्यु के सच से सीधे साक्षात्कार कराने वाली।
पानी की प्यास तो आजकल बहुत लग रही है - इतनी गर्मी जो है !
बहुत गहराई है यहाँ.
होंठ पर जीभ फेर
सूखी हवा को चख
एक बार फिर तरस
नीम बेहोशी ओढ़
अपने में ही सिंकुड़
सो जाता है
bahut gehri baat,kuch tis utha deti hai,badhai
फिर से प्रस्फुटित होने के पहले !
अफ़लातूनजी,
फिर से सो जाता है प्रस्फुटित होने के पहले ...
bahut gehri kavita beji
सुलगी हुई धूप
सूखी उँगलियों से
झकझोर कर
फिर जगा देती हैं
एक प्यास
नज्म की ये लाईनें दिल को छू गयीं...बहुत खूब...
बहुत गहराई है इस के meaning में
very nicely expressed. Nice blog. Everyone should read it.
Dr. Kusum
Nagda
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