
वहीं था...
.....खामोश....
उसका होना
वहाँ की हवा को पता था
शायद किसी स्पर्श से जाग जाता
कोई साँस की फूँक से
साँस लेता
पोर को थाम
उठकर गाने लगता
हथेली के नीचे
उछल कूद करके
शोर को भी
वह लय में सुनाता...
संगीत था तो वहीं बस
शायद समय की
प्रतीक्षा उसे थी
जो छूकर उसे दे....
बोलने का इशारा
ब्रम्हाण्ड में स्वर
घोलने का इशारा...




7 comments:
बहुत सुन्दर रचना...
***राजीव रंजन प्रसाद
शायद किसी स्पर्श से जाग जाता
कोई साँस की फूँक से
साँस लेता
पोर को थाम
उठकर गाने लगता
हथेली के नीचे
उछल कूद करके
शोर को भी
वह लय में सुनाता...
जिंदगी का गीत ....
आप की भाषा में कितना जीवन है? अथाह।
behad khubsurat
एक और अच्छी रचना.
बहुत सुंदर बेजी.
good one
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