Wednesday, May 07, 2008

आंसू


मैने देखा है
ओस की बूंद को
धूप में
सूख कर
हवा में उठते हुए
उड़ते हुए
जिद में अपनी
रुकते हुए
बादलों में ठहरते हुए
श्वेत से श्याम में
ढ़लकर
उजालों के आगे
धब्बे से लगते हुए
कतारों मे और भी
बूंदो को पीछे लगते हुए....
......
अपने ही भार से
लड़खड़ा कर
गिरते हुए....
बरसते हुए
फिर से बूँद बनते हुए.....
...................
उजालों को नहा कर
निकलते हुए
मुस्कुरा कर
इन्ही
बूँदों की गोद में
पसरते हुए

16 comments:

अफ़लातून said...

बहुत ख़ूब ।

lovely kumari said...

मनमोहक कविता... उम्दा शब्दविन्यास !!

mehek said...

bhavnao ki boondo ka chitran atisundar hai.

सुशील कुमार said...

लाजवाब

राकेश खंडेलवाल said...

बादलों में ठहरते हुए
श्वेत से शाम में
ढ़लकर
उजालों के आगे
धब्बे से लगते हुए??????

टंकण दोष या यही कहना चाह रही हैं आप ?

भाव विन्यास सुन्दर है

Beji said...

राकेशजी,

यही कहना चाह रही हूँ।
सूरज के उजालों पर बादल के सायों से धब्बे.....।

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप ने तो जीवन यात्रा की पूरी व्याख्या कर दी।

दिनेशराय द्विवेदी said...

शायद राकेश जी का इशारा शाम शब्द पर था, मैं ने भी इसे श्याम ही पढ़ा है।

अभिषेक ओझा said...

बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ

Beji said...

दिनेश जी,
जब से लिखा है मैं इसे श्याम ही पढ़ रही हूँ... :))
ध्यान दिलाने का शुक्रिया

Rajesh Roshan said...

बढ़िया भाव, सुंदर कविता

राजेश रोशन

मीत said...

Good one again, Beji.

Udan Tashtari said...

उम्दा भाव, उम्दा रचना!!

हर्षवर्धन said...

क्या बात है

DR.ANURAG ARYA said...

अपने ही भार से
लड़खड़ा कर
गिरते हुए....
बरसते हुए
फिर से बूँद बनते हुए.....
अच्छा लगता है जब कोई आशावादी कविता पढता हूँ....जिंदगी से भरपूर.....

Parul said...

अपने ही भार से
लड़खड़ा कर
गिरते हुए....
बरसते हुए
फिर से बूँद बनते हुए.....

bahut acchhey..