
मैने देखा है
ओस की बूंद को
धूप में
सूख कर
हवा में उठते हुए
उड़ते हुए
जिद में अपनी
रुकते हुए
बादलों में ठहरते हुए
श्वेत से श्याम में
ढ़लकर
उजालों के आगे
धब्बे से लगते हुए
कतारों मे और भी
बूंदो को पीछे लगते हुए....
......
अपने ही भार से
लड़खड़ा कर
गिरते हुए....
बरसते हुए
फिर से बूँद बनते हुए.....
...................
उजालों को नहा कर
निकलते हुए
मुस्कुरा कर
इन्ही
बूँदों की गोद में
पसरते हुए




16 comments:
बहुत ख़ूब ।
मनमोहक कविता... उम्दा शब्दविन्यास !!
bhavnao ki boondo ka chitran atisundar hai.
लाजवाब
बादलों में ठहरते हुए
श्वेत से शाम में
ढ़लकर
उजालों के आगे
धब्बे से लगते हुए??????
टंकण दोष या यही कहना चाह रही हैं आप ?
भाव विन्यास सुन्दर है
राकेशजी,
यही कहना चाह रही हूँ।
सूरज के उजालों पर बादल के सायों से धब्बे.....।
आप ने तो जीवन यात्रा की पूरी व्याख्या कर दी।
शायद राकेश जी का इशारा शाम शब्द पर था, मैं ने भी इसे श्याम ही पढ़ा है।
बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ
दिनेश जी,
जब से लिखा है मैं इसे श्याम ही पढ़ रही हूँ... :))
ध्यान दिलाने का शुक्रिया
बढ़िया भाव, सुंदर कविता
राजेश रोशन
Good one again, Beji.
उम्दा भाव, उम्दा रचना!!
क्या बात है
अपने ही भार से
लड़खड़ा कर
गिरते हुए....
बरसते हुए
फिर से बूँद बनते हुए.....
अच्छा लगता है जब कोई आशावादी कविता पढता हूँ....जिंदगी से भरपूर.....
अपने ही भार से
लड़खड़ा कर
गिरते हुए....
बरसते हुए
फिर से बूँद बनते हुए.....
bahut acchhey..
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