Thursday, May 08, 2008

आश्रय


तरंगों पर झूला
झूलकर भूलकर
नींद में खो जाने का
मन है.....

माँ तेरी गोद में
अँगडाइयाँ उतार कर
सो जाने का
मन है....

सहलाती उँगलियों से
जादू जो उतरे... उसमें
खो जाने का
मन है.....

तेरे आँचल में आ कर
हर चोट को...दर्द को
भूल जाने का
मन है.....

सहम कर जो सपने में उठूँ
जब कभी भी
तेरी खुशबू पकड़ सो जाने का
मन है...

तुझ में ही लौटकर
फिर एक बार..
अपनी पहचान पाने का
मन है....

तेरे स्नेह की छाँव में
खुद में सिमट कर सँभल कर
...जाग जाने का
मन है

7 comments:

अभिषेक ओझा said...

तेरे आँचल में आ कर
हर चोट को...दर्द को
भूल जाने का
मन है....

khubsurat panktiyaan !

दिनेशराय द्विवेदी said...

मां की गोद में तनिक
विश्राम चाहता है
तन-और मन
सारी थकान
मिट जाए,
फिर ताजा
कर जाए।

Udan Tashtari said...

वाह, बहुत खूब!!!

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

माँ तेरी गोद में
अँगडाइयाँ उतार कर
सो जाने का
मन है....

bahut sundar bhav hai in panktiyo mein.. maa ke liye likhi hui har rachna sundar hoti hai.. badhia swikar kare..

शोभा said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है। माँ ेक ऐसा शब्द है जिसपर जितना लिखा जाए कम है। माँ का प्यार शब्दातीत है।

DR.ANURAG ARYA said...

सहम कर जो सपने में उठूँ
जब कभी भी
तेरी खुशबू पकड़ सो जाने का
मन है...

सोच ही रहा था की mothers डे पर कुछ पढने मे नही आया कि देखिये आप मुस्कान बिखेरे आ गई ओर एक मुस्कान आपने चारो ओर बिखेर दी.....माँ पर कोई लकीरे भी खीच दे वो भी अच्छा लगता है .फ़िर आप तो बेजी है......

mehek said...

maa ke anchal si lehrati khubsurat kavita.badhai.