Saturday, May 10, 2008

विकल्प


हमेशा जिन्दगी
दाँव देकर
दुराहे पर मिलती है
और मुँह चिढ़ा कर
पूछती है
यह मुट्ठी कि यह
कभी एक में
मीठा झूठ
दूसरे में
कड़वा सच
एक में रूह की मंजिल
दूसरे में घर का पता
कभी अपनों से वफा
खुद से छल
कभी एक में सपना
और दूसरे में कर्तव्य
........
बंद मुट्ठी को देखकर
मेरा असमंजस जानकर
मुट्ठी खोलकर
पूछती है...
बताओ अब....
यह मुट्ठी कि यह

और मैं सोचती हूँ
जिंदगी के सवाल
हमेशा
इतने जटिल क्यों होते हैं.....?!

जीत कर भी हारा सा
अहसास
और हार कर भी
जीत का बिगुल....

जिंदगी क्यों कभी
मुट्ठी की
लकीरों में नहीं
थमती है.....?!

5 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

रुक जाए जो लकीरों में
वह जिन्दगी कहाँ?

Pramod Singh said...

लगता है मुट्रठी को संबोधित किशोर कुमार वाला वह गाना आप भूल गयी हैं- रूक जाना नहीं तू कहीं हार के.. एक दिन पायेगा मुट्ठी बुहार के? और भी कुछ गाने थे मगर अभी याद नहीं आ रहे? हो सकता है अब याद आ जायें! फिर विकल्‍पहीन, द्वंद्वहीन नहीं रहेगी दुनिया?

राजीव रंजन प्रसाद said...

जिंदगी क्यों कभी
मुट्ठी की
लकीरों में नहीं
थमती है.....?!

बेहतरीन कथ्य..


***राजीव रंजन प्रसाद

ajay kumar jha said...

shukra hai ki aapko jindagee miltee to hai hum to roz chaahte hai milnaa par nahin miltee.

DR.ANURAG ARYA said...

kuch raste "one-way" hote hai....