
हमेशा जिन्दगी
दाँव देकर
दुराहे पर मिलती है
और मुँह चिढ़ा कर
पूछती है
यह मुट्ठी कि यह
कभी एक में
मीठा झूठ
दूसरे में
कड़वा सच
एक में रूह की मंजिल
दूसरे में घर का पता
कभी अपनों से वफा
खुद से छल
कभी एक में सपना
और दूसरे में कर्तव्य
........
बंद मुट्ठी को देखकर
मेरा असमंजस जानकर
मुट्ठी खोलकर
पूछती है...
बताओ अब....
यह मुट्ठी कि यह
और मैं सोचती हूँ
जिंदगी के सवाल
हमेशा
इतने जटिल क्यों होते हैं.....?!
जीत कर भी हारा सा
अहसास
और हार कर भी
जीत का बिगुल....
जिंदगी क्यों कभी
मुट्ठी की
लकीरों में नहीं
थमती है.....?!




5 comments:
रुक जाए जो लकीरों में
वह जिन्दगी कहाँ?
लगता है मुट्रठी को संबोधित किशोर कुमार वाला वह गाना आप भूल गयी हैं- रूक जाना नहीं तू कहीं हार के.. एक दिन पायेगा मुट्ठी बुहार के? और भी कुछ गाने थे मगर अभी याद नहीं आ रहे? हो सकता है अब याद आ जायें! फिर विकल्पहीन, द्वंद्वहीन नहीं रहेगी दुनिया?
जिंदगी क्यों कभी
मुट्ठी की
लकीरों में नहीं
थमती है.....?!
बेहतरीन कथ्य..
***राजीव रंजन प्रसाद
shukra hai ki aapko jindagee miltee to hai hum to roz chaahte hai milnaa par nahin miltee.
kuch raste "one-way" hote hai....
Post a Comment